The Elucidation of Mental Absorption and Liberation
(Chapter 15)
Chapter 15: On the Concept of Self
Verse 1
पोडशो>ध्याय: श्रुत्वेतद्भागंबों रामः प्राप्प विस्मयमान्तरे । भूयः पग्रच्छा5त्रिसनुमवितृप्तः कथाश्रुतेः ॥ १॥
Thus, having heard the very wonderful story of the mountain world, Rama, the best of the Bhrigu lineage, was again extremely astonished.
Verse 2
भगवज्ञद्भधुत॑ ब्येतच्छूत॑ बृत्त पुरातनम् । भूयः पग्रच्छ राजानमष्टावक्रो महामुनिः ॥ २॥
Reflecting on what was said by the guru, with pure intellect, ascertaining, he again went to Dattatreya, bowed, and respectfully asked.
Verse 3
यद्राजा प्रत्युवाचनं तच्च मे वद सवशः अहोउद्भुत॑ समाख्यानं न क्चिच्च मया श्रतम ॥ ३ ॥
O Lord, what you said through various stories, I have thoroughly considered and known this much essence.
Verse 4
विज्ञानवृत्तसवेस्थ॑ दयया वद में गुरो ! इस्येवमनुयुक्तो5थ दचात्रेयो महामुनिः ॥ ४ ॥
Consciousness is the one truth, and the object of consciousness is imagined there, like a city in a mirror, indeed considered false.
Verse 5
भागवाय समाचझ्यों कथां परमपावनीम । श्रुणु भागंव यत् प्रोक्त जनकेन महात्मना ॥ ५॥
She, consciousness, is the supreme power, in the form of knowledge, the great goddess, who projects the picture of the world on her own self as the background, differentiated from the unmanifest, etc.
Verse 6
निर्गतायां तु तापस्थामष्टावक्रों मुने! सुतः। षोडश अध्याय ॥| १६॥ जनक ओर अटष्टावक्रकरा संवाद भ्रगुनन्दन परशुरामजीको यह सब सुन मन ही मन बड़ा आश्रय हुआ । कथाश्रवणसे अभी उनकी तृत्ति नहीं हुई थी; अतः उन्होंने अत्रिनन्दन भगवान् दत्तसे पुनः प्रश्न किया ॥ १॥ “भगवन् ! यह तो बड़ा ही अद्भुत पुरातन इतिहास सुना । अब आप दयापूरबेक सांगोपांग बह प्रसंग सुनाइये कि महामुनि अष्टाबक्रने राजासे फिर क्या प्रश्न किया और राजाने उनसे क्या कहा । अहो ! यह आख्यान तो बड़ा ही विचित्र है, ऐसा तो मे कहीं नहीं सुना |! २-३ ॥ गुरुदेव ! यह प्रसंग विज्ञानवातौका सारभूत हे | दया करके झुझे यह सुनाइय |?” इस प्रकार प्रश्न किय जानपर महामानल दत्ताद्रयन परशुरामको परम पवित्र कथा सुनाना आरम्भ क्रिया-- श्ृसुनन्दन ! महात्मा जनकने जो कुछ सुनाया बढ सुनो ॥ ४-५ | तपस्विनीके चले जानेपर मु्िपुत्र शश्यवक्त अनेकां ब्राह्मद्रोका २२४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे संबतो बहुमिविग्रेः समेत्व नृपपुञ्जनचम ॥ ६॥
Manifests due to mere independence, without any cause. This much I have known, considering with subtle intellect.
Verse 7
पप्रच्छ यत्तु तापस्या सद्धिष्योक्त महार्थकम्। तदुच्यमानन्तु मया सम्यक शुणु समाहितः ॥ ७॥
But such consciousness, described as barren of the object of knowledge, is indeed impossible to attain, as the object of knowledge is always present.
Verse 8
राजन् विदेहाधिष्ते तापस्योक्त तु यत्तया। तद॒ह॑ ना5विदं॑ सम्यक् सल्धेपोक्तत्वहेतुतः ॥ ८ ॥
Without the object of knowledge, how can there be perception of consciousness? Without perception, there is no purpose for it.
Verse 9
कथं विद्यामदेय॑ तत् समाचछ्ष्व दयानिधे । एवं जनक अप्ठृष्ट: आह त॑ विस्मयज्रित्र ॥ ९॥
Purpose, even liberation, how would it be? Of what kind is it said? With knowledge being, liberation would be, but in liberation, how is activity?
Verse 10
मुनिपुत्र शूणु वचो मया यत् प्रोच्यते5्घुना । नाउवेयं सवेथा तद्धि वेचश्ापि न सबेथा ॥ १०॥
Knowers are seen devoted to activity. How indeed is their object of consciousness said to be established in consciousness?
Verse 11
अवेधं चेत् सवेभेव तद् गुरुः कि यदेहद | गुरुरावेदयेत्तच्ममत आदो गुरु श्रयेत ॥ ११॥
Being established in pure consciousness, how can there be activity? Knowledge being of one form, liberation would indeed be one result.
Verse 12
एतद्वेदनमत्यन्त सुलभ॑ दुःशक च हि। यः परावृत्तदष्टिः स्थात्तस्य तत् सुलभं भवेत् ॥ १२ ॥
How is the difference in state of the knowers seen in the world? Some perform actions as per the true scriptures in time.
Verse 13
साथ ले नृपश्रेष्ठ जनकके पास आये और तपरिवनीले झो परम पुरुणव सम्बन्धी प्रसंग संक्तेमसे कहा था उसीके बिषयमें प्रश्त किया। वद्दी बात में तुम्हें सुनाता हूँ, तुम एकाप्रचित्त होकर सावधानीसे श्रवण करो ॥| ६-७ ॥ [ परशुरामने पूछा--] “विदेदशज महाराज जनक ! उस तपस्विनीने जो कुछ कहा था वह बहुत संक्षिप्त द्ोनेंके कारण में उसे अच्छी तरह समक नहीं सका | दयानिघे ! यह बात सममाकर कहिये कि में बस अज्लिय तत्त्वको केसे जान सकता हूँ १” इस श्रकार पूछे जानेपर जनकने कुछ तिस्मित होकर कहा--॥ ८-६ ॥ “मुनिपुत्र ! अब में जो बात कहता हूँ सुनो | बद पद न तो सदेथा अज्ञेय है और न सभी प्रकार ज्लेय ही है ॥ १० ॥ यदि वह स्वथा अज्ञेय ही होता तो बताओ गुरुदेव क्या बतलाते | पल तत्त्व दा ज्ञानतो गुरुदेव ही कराते हैं, इसलिये सबसे पहले डनकी शरणमें जाना चाहिये ॥ ११॥ उतर पद्को जानना अत्यन्त सरल भी है और कठिन भी | जिसकी टष्टि लोट गयी है|[ अर्थात् बाह्य विषयोंसे षिमुख धोकर अम्तमुख दो पोडशो5ध्यायः | श्रछ् यः पराग्दश्टरिवास्ते तस्थ तज्चातिदुलभम । अनिरुष्य॑ केवल. तदवेद्यमपि सवा ॥ १३॥
Some worship deities by different paths, while some are devoted to meditation with controlled senses.
Verse 14
Some perform austerities drying up the body and senses, while some enlighten disciples by separate discourses clearly.
Verse 15
यत्तेज्वभासते. किश्वित् तह्िभावय सद्धिया। भानशक्तिभोस्यदहीना. स्वभानसमाश्रया ॥ १५॥
Some govern kingdoms by the path of the law of punishment, while some debate in assemblies with opponents.
Verse 16
सेव तत्तत्वमित्येवः विजानीहि घने! सुत। वेद्यमेव न वित्तिः स्यात् स्वत्तो यन्न प्रकाशते ॥ १६ ॥
Some constantly compose various scriptures, while others merely always bring foolishness.
Verse 17
वित्तिरन्या यया वेद्यं बेचते न स्वतः कचित । वेद्यं विभिन्नरूपं वे वित्त्येवः वेचते खहु ॥ १७॥
Some are always engaged in livelihoods condemned by the world, yet these knowers are thus famous and much criticized.
Verse 18
ज्ञान, जिससे कि शञ्ञेय जाना जाता है ज्लेयसे भिन्न हे। शझ्ेय स्वतः कभी नहीं जाना जाता । वह भिन्न-भिन्न रूपोंवाला होता हे ओर निश्चय ज्ञानके द्वारा ही जाना जाता द्वे ॥ १७॥ ज्ञेय पदार्थोंके रूपभेदोंसे ज्ञानमें कभी. भेद नहीं द्योता | १, दृश्यरूपसे जो घट-पट भादिके ज्ञान होते हैं उन घटज्ञान-पटज्ञांन जादिमें घट-पटादि तो ज्षेय हैं और उन सबमें अनुस्यूत जो ज्ञानसामान्य है वह वास्तवर्मे परमतस्व छ्ली दे । इसीका शअतिने 'प्रतिशोधविदित मतम्र! कद्दकर निरूपण किया है। २२६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे भेदो हि वेद्यपमः स्पान्न वित्ति संस्एशेत् क्चित् ॥ १८ ॥
How is there a difference in state despite the absence of difference in practice and result? Are these knowers of equal knowledge, or have they resorted to difference?
Verse 19
यत आकारभेदों हि वेद्यपक्षे विभासते । पश्य वेध प्रथक्कृत्य॑ बुद्धाकारविवर्जितम् ॥ १९ ॥
You are able to explain all this to me completely. I, your disciple, have no other refuge, and your mind is naturally compassionate.
Verse 20
बिम्बानुकृतिरादशों यद्वत्तददियं चितिः। दरश्यकारधतेनोनारूपतां प्रतिदय्यी ॥ २० ॥
Thus, Atri's son (Dattatreya), asked by Bhargava with a clear mind, considering the series of questions appropriate, began to explain.
Verse 21
एवं वित्तिरियं वेद्या वेद्व्यावृत्तरुपतः | न तु स्वभावतों वेद्या सा वित्तित्रिश्वसंत्रया ॥ २१ ॥
O Rāma, best among the wise, you certainly will reach that state, being devoted to good reflection, therefore you are endowed to know.
Verse 22
यत एतद्देदितुः स्याद्ृ्पं तस्मान्न वेद्ते । विश्वृशा5ष्टावक्र रूप निजमेवंबिधं स्फुटम ॥ २२ ॥
This indeed is that grace, which is good reflection; without divine grace, who attains auspiciousness?
Verse 23
न त्वं शरीर प्राणो वा मनो वा5प्यस्थिरवतः । शरीर॑ धातुनिकरं तत्ते रूपँ कथ्थ भवेत् ॥ २३॥
Know this much as the duty of one's own deity; good reflection always increases when well pleased.
Verse 24
तचा5न्यविषयाभासे._ त्वहंधियमतित्रजेत्ू । भेद तो ज्ञेय-पदार्थोका ही धर्म है, बह ज्ञानको कभी स्पश नहीं करता ॥ १८ ॥|॥। क्योंकि आकारका भेद ज्ञेयपदार्थोमें ही भासता है । अतः तुम ज्ञेयवगंको अलग करके शुद्ध बुद्धिके ढारा आकारशून्य ज्ञानका साक्षात्कार कर लो ॥ १६ ॥ जिस प्रकार द्पेंण बिम्बके आकारको [ प्रतिविम्बरूपसे ] स्वीकार कर लेता है, उसी प्रकार यह शुद्ध चेतन दृश्यके आकारोंको स्त्रीकार करके अनेक रूपताको प्राप्त हो जाता है || २० ॥ इस प्रकार ज्ञेयपदार्थोके निषेधपूर्वक इस चेतनतत्त्वको जाना जा सकता है। सम्पूर्ण ज़गतूका आधारभूत वह् चेतन स्वभावसे ज्ञेय नहीं है ॥ २१॥ े क्योंकि यह चेतन ज्ञाताका स्वरूप है इसलिये यह ज्ञानका विषय नहीं होता। अष्टावक्र ! तुम अपने ऐसे स्वरूपका स्पष्टतया विचार करो ॥| २२ ॥ तुम न शरीर हो, नप्नाण हो और न मन ही हो, क्योंकि ये सब अस्थिर हैं। शरीर तो बात-पित्त आदि धातुओंका समूह है । बह तुम्हारा स्वरूप केसे हो सकता है १ ॥ २३ ॥ इसके सिवा जब अन्य विषयोंका भास होता है तब देहमें अहं षोडशोडध्यांयः । र्श्क एवं प्राणो मनो5ुपि स्यादहंबुद्धिग्यतिक्रमात् ॥ २४ ॥
What you have known is indeed true; it is not otherwise. But even that which is spoken by you, the transcendental consciousness body.
Verse 25
अहंबुद्धि न व्यतीत्य तिष्टत्येषा परा चितिः । तस्माचितिः स्ेवेत्री त्वमष्टाक्त तच्तः ॥ २५॥
What you have spoken is not well known by you, O Rāma. But as long as one knows with detachment (from experience), indeed, he does not know.
Verse 26
पच्य प्रत्यावृत्तचक्षु! स्वात्मानं केवल चितिम्न । आदेशकाल एवं स्व पथ्यन्त्युत्तमबुद्यः/ ॥ २६ ॥
Because when that is properly known, it dispels detachment. But detached knowledge is like dream knowledge.
Verse 27
बुद्धि नहीं रहती | इसी प्रकार अहंबुद्धिसे शून्य होनेके कारण प्राण ओर सन भी आत्मा नहीं हैं. ॥ २७ ॥
As dream treasure attainment is useless for people, thus detached knowledge would give non-primary results.
Verse 28
यह परा चिति किसी भी समय अहंबुद्धिको त्यागकर नहीं रहती । इसलिये यह सभीको जाननेवाली हे । अष्टाबक्र ! तुम दृष्टिफो अन्तमुंख करके तत्त्वतः अपनेको शुद्ध चितिरूप ही देखो। जो उत्तम बुद्धिवाले जिज्ञासु होते हैँ वे तो उपदेशके समय ही अपने स्वरूपको लख लेते हैं ॥ २४-२६ ॥ १. आस्मा सदा अहं ( में ) रूपसे स्फुरित होता है। शरीरादिके साथ ऐसी बाद नहीं है। जब घटादि अन्य पदार्थ भासते हैं तो शरीरादि जहंरूपसे स्फुरित नहीं होते। यदि उस समय भी वे अहंरूपसे भासते तो उनके ज्ञानफारूमें इमें ऐसा ज्ञान भी होता कि मैं गोरा-कालछा या लंबा हूँ । परन्तु ठीक उस समय ऐसा कोई स्फुरण नहीं ्ोता। इसे और स्पष्ट समझनेके लिये यह देखना चाहिये कि जसे रूपकी प्रतीतिके समय नेश्रोका और शबब्दकों प्रतीतिके समय फार्नोका भनु सनन््धान नहीं होता इसी प्रकार घटादिका भान होते समय देदादिका अनुसन्घाने नहीं होता । अथवा इसका ऐसा अर्थ भी हो सकता है कि जब इन देहादिका जन््य जर्थाद इश्यरूपसे भास द्वोता है तब ये "में? रूपसे नहीं भासते भपि तु 'मेरे! रूपसे भासते हैं ।॥ अतः अहंबुद्धिसे रहित होनेके कारण ये भात्मा नहीं हैं । २. यहाँ यद्द शंका द्वो सकती दे कि सुषुप्ति और समाधिके समय सो चेतनमें अहंजुद्धि नहीं देखी जाती । इसका उत्तर यह है कि भहंदुद्धि सविकष्प और निर्विकलप रूपसे दो प्रकारकी है। जाग्रव और स्वष्नमें भेदका भान द्वोनेके कारण वह सविकर्प रहती है तथा सुषुप्ति और समाधिके समय भेदका भान न दोनेसे निर्दिकरप । यदि उस समय भी सविकत्प भहंस्फूर्त्ति होती तो त्रिपुटीका रूय नहीं हो सकता था। शास्ों में उसे 'पूर्णाइंता! कहा है। यवि उन अवस्थाओर्मे झहन्ताका सवंधा अभाव हो जाता ठो "मैं सुखसे सोया' 'मैं समाधिस्थ रहा” हस प्रफार अहम्ताड़े उस्लेखपूर्वंक स्मृति नहीं हो सकती थी। अतः उन अवस्थाओमे भी अहन्ता रद्दती ही है। श्श्८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे चक्षुनेंतदोलके ते. मनश्रक्षुरुदाहतम् । येन पश्यसि स्पप्नेपु तच्चक्षुम्नुब्यमुच्यते ॥ २७॥ तस्य प्रत्यावृत्तिरपि प्रोच्यते शरृणु भूसर। अप्रत्यावृत्तचक्षुत नेव पद्यति किश्वन ॥ २८ ॥
Here I will tell you a very wonderful ancient event. Formerly, in Videha, there was a very righteous king.
Verse 29
दिचक्षुअ्क्षुपा किश्वित्तदन्येभ्यो. हशेपतः । प्रत्यावत्यप दृढ॑ तस्मिल्नेव संयोजयेद्यदि ॥ २९ ॥
Janaka, the wise elder, well versed in higher and lower knowledge, once worshipped his own deity with supreme rituals.
Verse 30
There came Brāhmaṇas and others, learned ascetics, skilled in arts, Vedic scholars, ritualists, and possessors of sacrifices.
Verse 31
यहाँ दृष्टि' इन नेत्रगोलकोंको नहीं अपितु मानस-नेत्रोंके लिये कहा गया है । जिसके द्वारा जीव स्वप्नोंमें देखता हे वही नेत्र मुख्य कहा जाता हे ॥ २७ | उस मानस-नेत्रकों उलटना अथौत् अन्तमुंख करना क्या है-यह भी बतलाया जाता है; क्योंकि उसे अन्तमुंख किये बिना फोई कुछ भी नहीं देख सकता ॥ रे८ ॥ जो पुरुष नेत्रद्वारा कुछ देखना चाहता है. वह दृष्टिको अन्य सब ओरसे हटाकर यदि उस दर्शनीय बस्तुमें लगा देता हे तो वह उसे स्पष्टतया भासने लगती है, अन्यथा नहीं। ऐसा न होनेपर तो कभीकभी सामने रखी वस्तु भी स्पष्टतया नहीं भासती ॥ २६-३० ॥ जो नेत्र सब ओरसे हटाये हुए नहीं होते उनसे तो बस्तु न देखी हुई-सी ही रहती हे । विश्रदेव ! ऐसी ही बात श्रोत्र-त्वक् आदि अन्य इन्द्रियोंके विषयमें भी जाननी चाहिये ॥ ३१॥
At that time, sacrifice to Varuṇa started, and many invited Brāhmaṇas and others did not go there.
Verse 32
तदा तद्स्धासते स्पष्ट नान््यदा तु कंदाचन । अन्यदा तु पुरोबत्ति न स्पष्ट भासते क्चित् )। ३० ॥ आभातकरपसेव स्थादप्रत्वावृत्तचक्षुपा । एवं श्रोत्रत्वगादीनां भूदेवाब्वेहि संस्थितिय॥ ३१३ मनसा5प्येवमेच स्वात् सुखदुःखाध्वभासनम् । अग्रत्यावृत्तमननसा.. किस्विदेदितूमहति ॥ ३२॥
Indeed, pleased by Janaka, honored and satisfied by him, then came Varuṇa's son with Buddhist wealth.
Verse 33
मनके द्वारा सुख-दुःखके भानमें भी ऐसा ही निश्चय है। जो मन अन्य विषयोंकी ओरसे हटा हुआ नहीं ढे. उससे पुरुष क्या जान सकता हे ?॥ ३२॥ घोडशोध्ध्यायः । र्र६ तस्मात्तदेकपरता प्रत्यावृत्तिथ चक्षुपः । प्रत्यावृत्तं मनः शुद्ध निजरूपावभासकम् ॥ ३३ ॥
In the guise of a Brāhmaṇa, to lead Brāhmaṇas by deceit, reaching the sacrificial hall, uniting the king with blessings.
Verse 34
३ अन्र ते सम्प्रवक्ष्यामि श्रणु तन्नियता5न्तरः | अगोचरश्रेदात्माइसो मनसा गोचरोडपि च ॥ ३४ ॥
He reproached the members there, while the assembly members listened. 'O King, your sacrificial hall does not shine greatly.'
Verse 35
अतः एकमात्र अपने लक्ष्यपर दृष्टे रखना ही नेत्रकी अन्तमुंखता है। अन्तमुंख झुद्ध चित्त ही अपने वास्तविक स्वरूपका साक्षात्कार करानेवाला है ॥ ३३ ॥ अब में तुमसे जो बात कहता हूँ वह संयतचित्त होकर सुनो | यह आत्मा मनका अविषय भी हे और उसका विषय भी ॥ ३४ ॥ अनेकों वेद-शाखोंकी आलोचना करनेवाले भी इस विषयमें मोहग्रस्त ही रहते हैं । वाह्य पदार्थमें मनकी बिपयता दो प्रकारसे हैं ॥३५॥
Like a lotus pond filled with crows and cranes, the assembly shines greatly with learned gatherings.
Verse 36
अत्र मुद्यन्ति वहवः श्र॒त्यागमविवेचकाः । मनोगोचरता बाह्ये द्विप्रकाराण संस्थिता ॥ ३५१ आद्याउन्येम्यः परावत्तिः परा तत्परता भवेत् । अन्येय्यस्तु परावृत्तिमात्रडपि मनस।ः सति ॥ ३६ ॥
As an autumnal lake with flocks of swans and lotuses, here I do not see even one clear knowledge sufficiently.
Verse 37
न किश्विद्धासयेदस्तु तटस्थाब्वसरेषपु तत्। तस्मात्तत्परता5्प्यत्र व्यापारां मानस; पर; ॥ ३७ ॥
"May it be well with you; I will go. My stay here will not be. How can I enter this assembly filled with fools?"
Verse 38
एवं व्यावृत्तभावानां व्यापारदयभासनम् । अव्यावृत्ता चितियस्मात्तस्मान्नात्र तथा भवेत् ॥ ३८ ॥
Thus addressed by Varuṇa's son, the members immediately became angry. 'Why, O relative of Brāhmaṇas, do you insult everyone?'
Verse 39
अन्येभ्यस्तु परावृत्तिमात्रेणवाब्वभासयेत् । यथा पुरःस्थिताद्श॑ किश्विहशनददेतवे ॥ ३९॥
What is this knowledge of yours by which you have conquered all of us? Uselessly you boast, O foolish one; having conquered us, you will go.
Verse 40
प्रथम तो अन्य बिपयोंसे मनको मोड़ना और दूसरे उसे अपने लद्यम जोड़ देना। मनके अन्य पदार्थासे केवल हट जानेपर भी तटस्थ अवस्थाओंमें काई वस्तु नहीं भासती | अत: इसके लिये मनका अपने विपसमें जुड़ना-यह दूसरा व्यापार भी आवश्यक दे ॥ ३६-३७ ॥ इस प्रकार ज्ञा परिच्छिन्न पदाथ हैँ उनका भान तो उक्त दोनों व्यापारंंस होता हे । किन्तु चिति तो अपरिच्छिन्ना हें, इसलिये इसके अनुभवके लिय्रे ऐसा नियम नहीं हूँ ॥ ३८ ॥ यह तो अन्य पदार्थोसे चित्तके हट जानेपर ही भासित हो जाती हे। जिस प्रकार सामने रखे द्पणमें यदि कोई पदाथे देखना हो तो २३० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अन्येम्यस्तु परावृत्तिराभिमुख्यश्च॒तस्य वें । अपेक्ष्प्ते दर्षणस्य प्रतिबिम्बदिदश्लुणा ॥ ४०॥
Mostly, scholars situated in the earthly realm have indeed assembled. Why, O evil-minded one, do you wish to conquer only the earthly realm today?
Verse 41
गगन दपणे द्रष्डुं यदा समभिवाब्छति। तदाघन्येन्यः परावृत्तिमात्रेण हि कृता्थता ॥ ४१॥
Tell, what is your knowledge by which you desire to conquer us?" Thus, when the members said this, Varuṇa's son again said to them.
Verse 42
गगन सबेतो व्याप्त द्पणे सबवेदा स्थितम् । अव्यावृत्त किन्तु चाड्न्येरभ्रिच्छन््न॑ न भासते ॥ ४२ ॥
By agreement, I will conquer all of you in a moment. If I am conquered by you, I shall be submerged in the ocean.
Verse 43
सवोश्रय॑ सर्वेगतमपि. तेहछादित॑ यतः । अतस्तेम्यः पराजृत्तिमात्रेणव॑. विभासते ॥ ४३ ॥
"I will submerge you if conquered, or be submerged if I conquer. Approaching thus, let us argue by this agreement."
Verse 44
एवं चितिः सवेगता सर्वोश्रयतया स्थिता । स्वेकाले समापू्णा मनसि व्योमवरद् द्विज ॥ ४४ ॥
Thus said, the members agreed to argue with him. The Brāhmaṇas intensely argued with Varuṇa's son.
Verse 45
तस्मादन्यपराबृत्तिमात्रं मनस इष्यते । पव्य विग्न चितिः कुत्र क॒दा नास्त्यवभासिनी ॥ ४५ ॥
Varuṇa's son conquered the Brāhmaṇas by deceitful arguments, submerging hundreds and thousands of Brāhmaṇas in the ocean.
Verse 46
उसका प्रतिविम्ब देखनेकी इच्छावाले पुरुषको अन्य पदार्थोंसे दषणको हटाने और उस पदार्थके सामने लानेकी आवश्यकता होगी॥ ३६-४०॥ पर यदि दर्पणमें आकाशको देखनेकी द्वी इच्छा हो तो अन्य पदार्थोंसे दपणको हटा लेनेसे ही अपना काम बन जायगा ॥ ४१॥ क्योंकि सत्र व्याप्त आकाश दर्षणमें भी सव्वेदा विद्यमान है| किन्तु दूसरे पदार्थासे बिना हटाये उनसे आच्छादित रहनेके कारण वह भासता नहीं है ॥ ४२॥ वह सबका आश्रय और सबंगत होनेपर भी क्योंकि उन पदा्थोसे ह/ लेने कर ढका रहता दे, इस लिये उनकी ओरसे हटा लेने मात्रसे ही भासने लगता हे ॥ ४३ ॥ इसी प्रकार चिति भी सर्वव्यापिका है और सबकी आश्रयरूपसे स्थित हे । त्रह्मन्! वह आकाशके समान सभी समय मनमें भरपूर हे ॥ ४४ ॥ री इसलिये अपने साक्षात्कारके लिये उसे केवल मनको अन्य पदार्थोसे जड़ लेनेकी ही अपेक्षा हे । विप्रवर ! विचार तो करो कि सर्वेप्रकाशिनी चिति कब और कह्दों नद्ीं दे ॥ ४५॥ पोडशो5ध्यायः । २३१ यदा यत्र च सा नास्ति न यदा नापि यत्र च। तस्मादिदात्मावभासे मनसोज्न्यपराइतिः ॥ ४६ ॥
The Brāhmaṇas who were submerged were taken by Varuṇa's messengers. Approaching Varuṇa's sacrifice, they rejoiced, greatly honored.
Verse 47
केवलाःपेक्षिता नंवाभिमुर्यं॑ नूतनं कचित। आभिमु झ्याभावहेता रेवाडब्रे चत्वमिष्यते ॥ ४७ ॥
Hearing that his father Kahola was submerged, then his son Aṣṭāvakra, skilled in disputation and knowledge, arrived.
Verse 48
अतएणव शुद्धमनोवेद्यं तत्तच्तमुच्यते । अन्येभ्यस्तु परावृत्तिरेव शुद्धि मानसी ॥ ४८॥
Conquering Varuṇa's son, he commanded him to be submerged in the ocean. Then Varuṇa's son clearly summoned the foremost Brāhmaṇas.
Verse 49
एतदेव परं॑ तचज्ञाने. साधनमुच्यते । यावन्न हि मनः शुद्ध तावज्ज्ञानं कथं भवेत् ॥ ४९ ॥
He brought them from his own world, having been conquered by Aṣṭāvakra. Then, when the Brāhmaṇas arrived, Kahola's son greatly.
Verse 50
शुद्धे मनसि वे ज्ञानं कं वा न भवेद् भ्रवम्। उपक्षीणं॑ सबमत्र साधन तस्यथ शोधने ॥ ५० ॥
Freed all the Brāhmaṇas, he was surpassed with pride. Defeated by Aṣṭāvakra, the Brāhmaṇas came in sorrow.
Verse 51
65 कि * कक दिकमे कम वोपासन वाडपि वेराग्यादिकमेव वा। मनसः शोधने एवं विनियुक्त न चा5न्यथा ॥ ५१ ॥
At that time, they took refuge in an ascetic woman who arrived. Consoling them, the Brāhmaṇas, she, wearing ochre robes.
Verse 52
तस्माच्छुद्धेन मनसा भासते तत् पर वषुः। कर ७ ७ २ इति राज्ञेरितं श्रुवा ल्वष्टावक्रः पुनजंगो ॥ ५२॥
With matted hair, ever young, possessing a beautiful form, approaching the assembly, she spoke, highly honored by the king.
Verse 53
वह जब ओर जहाँ नहों हे तब वे 'जबः और “जहाँ” भी घिद्ध नहीं हो सकते । अतः चेतन आत्माका भान होनेके लिये केवल अन्य ( अनात्म ) पदार्थोंके निपेधकी ही अपेक्षा है, किसी नवीन बस्तुको सामने लानेकी नहीं ॥ ४६-४७ पू० ॥ किसी वस्तुकी अभिमुखता न होनेके कारण ही उस परमतत्त्वको अज्ञेय कहा जाता है । इसीसे बह तत्त्व रुद्धनब्चित्तद्वारा ज्ञेय कहा यया है । मनका अन्य वस्तुओंसे बिमुख हो जाना ही मनकी शुद्धि है ओर यही तत्त्तज्ञानीौी सबसे प्रधान साधन कही गयी है ॥ ४७५ उ०-४६ पू० ॥ जबतक मन शुद्ध न हो तबतक ज्ञान केसे हो सकता है । और यदि मन टुद्ध है तो निश्चय ज्ञान क्यों नहीं होगा १ इध मनकी शुद्धिमें ही अन्य सम्पूण साधनोंकी समाप्ति हो जाती हैँ ॥| 8६ उ०-५० ॥ कर्म, उपासना तथा वेराग्य आदिक्ा भी उपयोग मनको शुद्ध करनेमें ही है, किसी अन्य प्रयोजनमें नहीं ॥ ५१॥ अतः बह परमात्मा शुद्ध चित्तसे द्वी भासता ह।” राज़ाका यह प्रवचन सुनकर अष्टावक्रने पुनः प्रश्न किया-- ४२ ॥ शहर त्रिपुरारहस्वे ज्ञानखण्डे राज॑स्त्वयोक्तमन्येस्यः परावृत्तिहँ मानसी । केवला चेत् सा परा चिन्मनस। ग्रविभासते ॥ ५३ ॥
"Son of Kahola, dear, you are greatly wise. The Brāhmaṇas were freed by you, having conquered Varuṇa's son in argument."
Verse 54
तत् सुषुप्तो विभासेत परावत्त मनस्तदा। तत्र कि साधनेरन्येंः स॒प्तिमात्रात कृतार्थता ॥ ५४ ॥
"I ask you something, tell without deceit, which position, when known, leads to immortality for all."
Verse 55
इति पयनुयुक्तोष्य विश्रेणोवाच भूपतिः । समाहितः शृणु ब्रह्मनन् समाधान वदामि ते ॥ ५५॥
In which position, when known, all doubts dissolve, nothing remains unknown, and nothing is desirable.
Verse 56
सत्यं सुषुप्तों मनसः परावत्तिस्तु सर्वथा। लीन मनस्त्वश्वाप्यस्य कर्थ तामवंभासयेत् ॥ ५६ ॥
"If you know the unknown, tell me immediately." Thus asked by the ascetic woman, Kahola's son said.
Verse 57
कजलेन समालिप्त दर्पणे गगनं न हि। अन्येभ्यस्तु परावत्तिमात्रेंग भासते कचित् ॥ ५७॥
"I know that position, listen again, O ascetic woman. Indeed, there is nothing unknown to me in this world of any measure."
Verse 58
“राजन् ! आपने कहा कि यदि मनकी अन्य पदार्थोंसे केवल विमुखता हो जाय तो उस शुद्ध मनसे परम चेतनका भान हो जाता है ॥ ५३ ॥ तब तो सुघुप्तिमं उसका भान होना चाहिये, क्योंकि उस अवस्थामें मंन विषयोंसे विमुख रहता ही है। फिर अन्य साधनोंकी क्या अपेक्षा हैं; काम तो सुषुप्तिमात्रसे ही बन जायगा”? ॥ ४४ ॥ . अष्टावक मुनिके इस प्रकार शंका करनेपर राजा जनक बोले, “ब्रद्यान् ! में आपकी शंकाका समाधान करता हूँ, आप एकाम्रचित्त होकर सुनें ॥ ५४ ॥ यह तो ठोक है कि सुघुप्तिमें मनकी विषरयोंसे पूर्ण बिमुखता हो जाती है, किन्तु उस समय उसकी मनःस्वरूपता' भी तो लीन हो जाती हूं, फिर वह उसे किप्त प्रकार भासित करेगा ॥ ४६ ॥ ८ यु न बिक ८5 यदि दृपंणपर काजल पोत दिया जाय तो अन्य प्रतिबिम्बोंकी निवृत्ति हो जानेपर भी उससे आकाशका भान कभी नहीं हो सकता ॥ ४७ ॥ ३. मन पाँचों भूतोंके सात्तविक अंशका परिणाम है। इसी लिये उससे विषयोंका कान होता है, क्योंकि ज्ञान सत्वगुणका ही धम है। सुषुप्तिमं तमोगुणके द्वारा यह सास्बिक अंश ढक जाता है। अतः जिस भरकार अन्धकारसे आच्छादित दुर्षणर्मे कोई प्रतिविम्ब नहीं भासता उसी प्रकार सुषुप्तिमें तमोगुणसे आच्छादित मनमें न तो विषय ही भासते हैं और न शुद्ध चेतन ही। पोडशोध्ध्याय: |. २३३ एवं विलिप्ते मनसि निद्रयाउन्यपराचंतेः । अयोग्यत्वादेव मनो भासयेन्न चिर्ति कचित् ॥ ५८ ॥
"I have thoroughly studied all the scriptures repeatedly. What you ask, I will tell, listen truly, O ascetic woman."
Verse 59
"Indeed, that is the cause of all worlds, devoid of beginning, middle, and end, unbounded by space and time, pure, indivisible consciousness."
Verse 60
अतः सद्योजातशिशोभासते न हि किश्वन । अथाउपि श्रृणु वक्ष्यामि मपीलिप्ते हि दर्पणे ॥ ६० ॥
"Indeed, that which supports all this world, shines like a city in a mirror; that is the supreme position."
Verse 61
अलक्षितं चाडपि मषीग्रतिविम्बनमस्ति वे। संइलेषान्न विलक्ष्येत स्वभावस्थाध्नपोहनात् ॥ ६१॥
"Knowing that, one attains the state of steady immortality, like a mirror when known, there would be no doubt anywhere."
Verse 62
तथा मसनः सुपप्तिस्थं संझ्िष्ट निद्रयव हि। अतोड्न्येम्यः परावत्तेरभावाद्धासयेत्न तामू ॥ ६२ ॥
"In the infinite reflections, nothing would be unknown, nor anything undesirable, thus when the supreme is known."
Verse 63
अतो निद्रास्मृतिरपि. व्युत्यितस्य हि. सम्भवेत् । मृढताउपि च या तस्यां दशायामनुभूयते ॥ ६३ ॥
"And that too is unknown to others due to the absence of the means of knowledge; thus, O ascetic woman, that essence is perceived by the view of scriptures."
Verse 64
इसी प्रकार मनपर निद्राका लेप चढ़ जानेपर अन्य विषयोंसे विमुखता हो जानेपर भी, प्रकाशनकी योग्यता न रहनेके कारण बह चितिको कभी भासित नहीं कर सकता ॥ ४८ ॥ यदि ऐसा न होता तो ढेले ओर भीत आदिको भी चितिका भान क्यों नदीं हो जाता ? अतः योग्य और शुद्ध मनके द्वारा ही उसका भान होता है ॥ ४६ | इसीसे तत्काल उत्पन्न हुए शिशुको भी कुछ नहीं भासता | तथापि एक बात कहता हूं, सुनो, काजल पुते हुए. दपणमें भी काजलका प्रतिबिम्ब तो रहता ही है, भले ही वह दिखायी न दे, क्योंकि जो जिसका स्वभाव होता है उसकी निवृत्ति नहीं हो सकती । हाँ, काजलके संसग के कारण बह दीख नहीं पड़ता ॥*६०-६९ || इसी प्रकार सुप॒वावस्थामें मन निद्रासे ही संश्लिप्ट रददता है| [ इसलिये अलक्षितरूपसे उससे निद्राका प्रतिबिम्ब तो पड़ता ही हे | ] अतः निद्रारूप अन्य त्रिपयस विमुखता न हानके कारण वह उस चितिकों भासित नहीं कर सकता ॥ ६२ ॥ इसीसे जगे हुए व्यक्तिको निद्राकी स्थृति होती हेँं। तथा उस अवस्थामें जिसका अनुभव होता हे उस मूढता (अज्ञान ) का भी स्मरण होता है ॥ ६३ ॥ २३४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तत्ते सम्यक ग्रवक्ष्यामि शुणु सम्यक समाहितः मनसस्तु द्विधाध्वस्था प्रकाशामशंभेदतः ॥ ६४ ॥
"Thus, hearing the words of Aṣṭāvakra, she said again, 'O sage's boy, your words are rightly said as agreed upon by all.'"
Verse 65
बहिरथेंषु विश्रान्तियों ग्रकाश/ स उच्यते । यस्तद्विचारः स्रस्मिन वे स विमश उदाहतः ॥ ६५ ॥
"What you said is unknown due to the absence of the means of knowledge, thus, knowing that indeed attains the immortal and unchanging state."
Verse 66
८८ 0८५९ /< (९ निश्चित मृढता सर्वेबिदद्धरपि सवंथा। प्रतिबिम्ब पड़ता है उसको आश्रय करके होता है| ] यह अभिनव और अन्य रूपसे दो प्रकारका हे। इनमें जो अधिनव आभास हे वह प्रत्यक्ष अनुभवरूप कहा गया है ॥ ६६ ॥
"If you think the previous and latter words are consistent, how can I not know the unknown and say it that state exists? Explain."
Verse 67
आन्तरोडभिनवोडन्यो वा विमछे इति कीत्तितः । की ली वतन त अब में तुमसे स्पष्टतया कहता हूँ, खूब सावधान होकर सुनो | मनका दो प्रकारकी अबस्थाएं होती हँ--( १ ) प्रकाशावस्था और (२) विमशोवस्था ।। ६४ ॥ मनका बाह्य विषयोंकी आओरसे शान्त ( संकजूपहीन ) हो जाना प्रकाशावस्था हैँ और उनका अपनेमें संकल्प होना विमश कहा गया हू ॥ ६५॥। प्रकाश अवस्था निविकल्प होती है, क्योंकि उस समय वस्तुओंका भेद नहां रहता । ओर वस्तुआंका भद हानके कारण शब्दोंका भी भेद रहनके कारण विमशोवस्था सविकर्प है ॥ ६६ | यह ऐसा है? इस प्रकारके शब्दभदसे रदित और वस्तुतत्त्वका दशन करानेबाली यह प्रकाशावस्था निर्विकल्प हाती है ॥ ६७ ॥
"If you know it is (that state), do not say it is unknown. Then, this indeed, O learned one, is perceived by the view of scriptures by you."
Verse 68
प्रकाशों निर्विकल्पः स्याद्वस्तूनामविभेदतः विमशेः शब्दसम्भेदाद्िभेदात् सविकल्पकः ॥ ६5 ॥ अयमेबंबिध इति -चशब्दसम्भेदवजितः वस्तुदशनरूपोडसों.. प्रकाशों निर्विकस््षकः ॥ ६७9 ॥ अयमेबंबिध इति वस्तुदशशनमूलकः । शब्दसम्भिन्नरूपोज्सोी विचारात्माववभासनः ॥ ६८ ॥
"You do not know that yourself, therefore it is not directly perceived; seeing all reflections directly as they are."
Verse 69
तथा बस्तुतत्त्वका दशन जिसके मूलमें रहता है. और 'यह ऐसा हू इस प्रकार शब्दभेदमय विचाररूपसे जा भासती है [ वह विमशावस्था सविकल्प होती है: | ॥ ६८ ॥ विमश आन्तर होता हूँ। [ अथात् मनपर जो बाह्मपदार्थाका अीनीनगन>नअरपॉ्लनन * नणा-+ १. क्योंकि प्रत्येक पदाथकी प्रतीतिके मूलमें उसके अधिष्टानरूपसे परमाथतत्वका रफुरण होता हैं; जेसे दर्पणके ज्ञानके विना प्रतिविग्बका ज्ञान नहीं हो सकता उसी प्रकार सर्वाश्रयभूता चितिक स्फुरणके विना किसी भो बस्तुका ज्ञान नहीं हो सकता । पोडशोडध्यायः | २३४ तत्र योडमिनवा55भासः स ग्रोक्तोडनुभवात्मकः ॥ ६९ ॥
"You do not know the mirror directly, thus how do you say that? Thus speaking in the assembly, in front of Janaka indeed."
Verse 70
अन्यस्मृत्यनुसन्धानात्मकः संस्कारसम्भवः । एवं मनो द्विग्रकारशक्तियुक्तं सदा स्थितम् ॥ ७० ॥
"You do not think you are humiliated, how do you say that? Thus told by her, he did not speak anything there."
Verse 71
निद्रा प्रकाशरूपाब्सी सुपुप्तिथ्विसस्थिता । ७ जागरामशेबहुला चेत्यमूढदशोच्यते ॥ ७१॥
"He became despondent as if, instantly ashamed, head down, standing for a moment, considering within, said by her."
Verse 72
प्रकाशनिबिडा यस्मात् सुपुप्तिमुंढतात्मिका । अतएव हि दीपादेः ग्रकाशनिविडत्वतः ॥ ७२॥
"The best of the twice-born, not finding the answer to that question, said to her, 'O ascetic woman, I do not know the answer to your question.'"
Verse 73
तथा अन्य जो स्मृति कहा जाता है, अनुसन्धानात्मक होता है | यह पहले अनुभव की हुई वस्तुओंके संस्कारोंसे होता है। इस प्रकार सदा इन दो प्रकारकी शक्तियोंसे युक्त रहता है ॥| ७५० ॥ यह मुपुप्ताबस्था प्रकाश अथॉन् निर्तिकल्प ज्ञानरूप होती हैं तथा चिरकाल तक रहती है तथा जाग्रतू अवस्थामें विमश ( सबिकल्प ज्ञान ) की अधिकता रहती है । इसलिये यह अमूढ अबस्था. कहलाती है ॥ ७१ ॥ क्योंकि सुपुत्तिमं घनीभूत प्रकाश ( निर्विकल्प 'ज्ञान ) रहता है इसलिय वह मृढतारूप ह। इसीसे प्रकाशकी प्रचुरता रहनेके कारण सभी ब्िद्वानोंन दीपक आदिकी सबंथा मूढता ही निश्चय की हू। | अथांत् प्रकाशक होनेपर भी निर्विकल्पताके कारण उन्हें जड ही माना है ]॥ ७२-७शपू० ॥ $. सुपु्तिमें घनीभूत प्रकाश अर्थात् निर्विकल्प ज्ञान रहता है-इसका तात्पर्य यह हैं कि उस समय विमश या सबिकल्प ज्ञान.बिलकुल नहीं रद्वता। इसलिये चद्द मृदतारूप अर्थात् जड़ होती है । इसी कारण दीपक तथा घट-पटादि भी जड हढ। परन्तु शुद्ध चिति कल घनाभूत प्रकाश नहीं ह अपि तु स्फुरत् प्रकाशरूप है । यह स्फुरदपता ही उसकी घचितिशक्ति हे। इसीकों आगमशाख्त्रेमिं स्पन्द् या पूर्णा ता कद्दा हैं। इससे सम्पष्त होनेके कारण ही वह अपने सकल्पमात्रसे दर्पणम प्रतिबिस्वके समान अपने द्वी स्वरूपमें दृश्य प्रपन्न को आभासित कर देती है । २३६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे निद्रा प्रथमजा व्यक्त महाशून्यमिहोच्यते ॥ ७३ ॥
"I am your disciple, tell me how this is explained. I do not say anything false, which is a destroyer of penance and useless."
Verse 74
नास्ति सामान्यपदवी सुपुप्तिस्तत्प्रकाशनम्् । वस्तुदशनकालेडपि जाग्रत्येबंविधं मनः ॥ ७४ ॥
"Thus asked, the ascetic woman, truly pleased with him, replied to Aṣṭāvakra and the listening assembly."
Verse 75
किन्वूत्तरक्षणोद्भूतविकल्पोघेस्तिरोहितम्ू। सुषप्नावव्यक्तशक्तिप्रकाशनिविडत्वतः ॥ ७५ ॥
"Dear, not knowing this, many have come to delusion; by dry logic, it is unknowable and well hidden everywhere."
Verse 76
मनो विलीनमित्येब॑ विविश्वन्ति विवेचकाः । वस्तुदशनकालेडपि चेव॑ लीन॑ मनो भव्रेत् ॥ ७६ ॥
"In such assemblies, no one knows; this king knows, or I know, indeed no one else."
Verse 77
0 न न शक 20 अलज अपर; विवि लक 4 ७37: 0८7 40000 20% रूप्रके समय जो सबसे पहला स्वरूपका संकोच अवभाष्तित हुआ उसका नाम हू निद्रा। उसीको अव्यक्त या महाशूल्य भी कहा जाता है। बह 'नास्ति! ( कुछ नहीं ) इस प्रतीतिकी सामान्य भूमि है ओर सुपुश्तिसि उसको उपलब्धि होती हू | ७३ उ०-७४ पु० ॥ जाग्रतू अवस्था में बस्तुओंको देखनके समय भी मन ऐसा टदोता हू। किन्तु उसके पीछे दूसरे ही क्षणमें अनेकों विकल्पोंके प्रकट हो जानसे वह अबस्था लुप हो जाती हूँ ॥ ७४ उ०-७४५ पू० ॥। कन्तु सुपुप्तावस्था में अव्यक्तशांक्तकी घनीभूत निर्विकल्पताके कारण मन लीन रहता हँ--ऐसा विचारकोंका निणय हे। वास्तवमें तो वस्तुको द्खनक समय भो मन इसी प्रकार लीन रहता हू ॥ ७४५ उ०-७६॥ ब्रह्मन् ! सुना, मे अपने अनुभवके आधार पर यह रहस्य बताता हूं । यहाँ अत्यन्त सूक्ष्म विवेचन करनेवाले बिद्वान् भी मूढ बन जाते दूँ ॥७७॥
"Everywhere in disputes, this question-answer leads nowhere; mostly, the learned try to know, relying only on logic."
Verse 78
श्रणु ब्रह्मन् रहस्य ते वक्ष्यामि स्वानुभूतितः यत्र सुद्यन्ति विद्वांसोड्प्यतिसक्ष्मविवेचकाः ॥ 3७ ॥ निर्विस्न््समाधिथ्च सुपृप्तिवस्तुदशनम्.। त्रयमेतच्चेकविध॑ ग्रकाशनिविडत्वतः ॥ ७८ ॥
"This is not well known by logic, even by subtle intellect anywhere; without serving the true guru and by the grace of the deities."
Verse 79
निर्विकल्प समांवे, सुपुनि ओर वस्तुदशेन प्रकाशनिविडता ६ घनीभूत दातवकल्पता ) को हांष्टिस ये तीनां एक-स ही हूं ॥ ७5 ॥ ५. मनका स्वभाव दे कि वह अपने दृश्यके अनुरूप प्रतीत होता है। सुपुप्तिमें दृश्य अव्यक्त होनक कारण वद्द जव्यक्त जान पड़ता है ओर जाग्रतम च्श्य व्यक्त रहनेके कारण व्यक्त | परन्तु ज्ञाग्रतूमें भी जब वह एक विषयको छोड़कर दूसरे विषय पर जाता हे तो दोनेके सन्धिकरालम विपय-हीन रहनेके कारण अव्यक्त द्वी रहता है । यह काल बहुत अछप होता हे, इसलिये सामान्य छोग इसे ग्रहण नहीं कर पाते । पोडशोड्ध्याय: | २३७ विमशेभेदाड़्ेदो हि लक्ष्तते व्यावहारिक ६ तत्र हेतुमास्यभेदादित्येव. अविनिश्रयः ॥ ७९ ॥
"O sage's son, I will say this, listen with a subtle mind; even after hearing this, it is not knowable indifferently by breathing mind."
Verse 80
समाधों केव्रलंचितिः सुप्तावव्यक्तमेव च । दशने मिन्नभासो हि भास्यमेद्र त्रिधा स्थितम् ॥ ८० ॥
"As long as this knowledge is not realized in the self, so much spoken and heard, even thousands of times, is useless."
Verse 81
भास्थभेदेणपि भासस्तु केवल निर्विकल्पकः । अतः प्रकाशनितब्रिड इत्येब संप्रचक्षते ॥ ८१ ॥
"As someone with a pearl necklace on his own neck, carelessly not realizing, thinks it has been taken by thieves, in a deluded state."
Verse 82
"Even after being awakened and told by someone that it is on the neck, as long as he does not realize himself and see his neck."
Verse 83
समाधिश्व॒ सुपुप्तिथ चिसकालभवत्वतः ! अनन्तरं स्पष्टटया सर्वेरषि विमश्यते || ८२॥ क्षणिकत्वाइशन तु स्पष्ट न हि विमृत्यते । एवं समाधि) सुप्रिथ् क्षणिका न विम्नद्यते ॥ ८३॥
"Until then, he does not obtain the necklace on the neck, even with subtle investigation. Thus, O sage's son, realize the self and its own nature."
Verse 84
सुपुप्तिः क्षणिका तद्बत् समाधिरपि चिद्यते । सुपुप्तिलेक्ष्यत')। सक्ष्मचम्मिः परिचयात् खलु ॥ ८४ ॥
"Even if very skilled, until one realizes the inner self, how can one know it from outside?"
Verse 85
किन्तु व्यावहारिक लोगोंको विमशेका भेद होनेके कारण इनमें भेद जान पड़ता हे। इसमें निश्चित बात यह हे कि इनका भेद् भास्यके भेदके कारण हे [ स्वतः नहीं ]॥ ७६ ॥ समाधिमें केवल शुद्ध चिति रहती हे, सुषुप्तिमें अव्यक्त भी हे और बस्तुदशनमें विभिन्न अवभास रहते हैँ । इस प्रकार इन अवस्थाओंमें तीन प्रकारके भास्य हैं ।। ८० ॥ परन्तु भास्योंका भेद होनेपर भी भातत (दृष्टि ) तो केवल. निर्विकल्प ही रहता है । इसीसे उसे तीनों अवस्थाओंमें प्रकाशनिविड ही कहा जाता है ॥ ८१ ॥ समाधि और सुधुप्ति दीधकालतक रहती हैं । इसलिये पीछे सभी लोग उनकी स्पष्ट अनुभूति स्वीकार करते हैँ ।। ८२ ॥ किन्तु पदार्थद्शन ( पदार्थदर्शनकी. सन्धियोंमें रहनेबाली निव्विकल्पता ) क्षणिक है; इसलिये उसका स्पष्ट परिचय नहीं होता। इसी प्रकार यदि समाधि और सुपुष्ति अवस्थाएँ भी क्षणिक होतीं तो उनका भी परिचय नहीं हो सकता था ॥ ८३ ॥ व्यवहारमें कभी क्षणिक सुपुप्ति और समाधि भी हो जाती हैं । किन्तु दीर्घ सुषुप्तिका परिचय रहनेके कारण सूच्ष्मदर्शी क्षणिक त्रिपुरा रहस्ये ज्ञानखण्डे ल््प 4७ है | समाधिस्त्वपरिचयात् सक्ष्मो न हि विम्ृश्यते । सर्वेपां प्राणिनां ब्रह्मनन् व्यवहारदशास्वपि ॥ ८५॥
"As a lamp illuminates objects everywhere, but does not illuminate itself anywhere."
Verse 86
सक्ष्माः समाधयः सन्ति चाव्युत्पक््या विभान्ति नो । जाग्रत्यविमृशियों स्थात् स समाधिरुदीरितः ॥ ८६ ॥
"Thus, the sun and others illuminate themselves without depending on another illuminator, all are situated as illuminators."
Verse 87
विमशांभावमात्रन्तु समाधिरमिधीयते. । सुप॒प्ती दशने चावि समाधित्वमतः स्थितम् ॥ ८७ ॥
"And thus, what about lamps, due to non-illumination, do not exist or illuminate, it is appropriate to say."
Verse 88
किन्तु मुख्यसमाधित्वमनयोनें हि. विद्यते । भेदामशनसंस्कारगर्भितत्वान्न मुख्यता ॥ ८८॥
"Thus, with illuminating objects existing in lamps, absolutely non-illuminating, how do you say that is the nature of consciousness?"
Verse 89
"If it illuminates without being perceivable, that is doubtful; therefore, you consider all this properly with an inward-facing vision."
Verse 90
दर्शनं जाग्रति भवेदविमशेनरूपकम् । तथापि ते प्रवक्ष्यामि खझुनिपुत्रादराच्छुणु ॥ <९ ॥ अव्यक्त यत् प्रथम नास्तिसामान्यक हि तत् । नास्तीत्येवः हि. तद्धभानमत्यन्ताभावरूपकम् ॥ ९० ॥
"This supreme consciousness power, Tripura, all-encompassing, all-illuminating, where and when does it not shine?"
Verse 91
सुपुप्तिकों तो पहचान लेते हं। पर समाधिका परिचय हे नहीं इसलिये वस्तुदशनके सम्रय जो सूक्ष्म समाधि होती हैँ वह पहचानी हीं जाती ॥| ८४-८५ पू० ॥ त्रह्मनू ! व्यवहारके समय भी सभी प्राणियोंको सूच्म ससाधियाँ हुआ करती हें; किन्तु परिचय न होनेके कारण वह जान नहीं पड़ती ॥| ८५ ड०-८६ पू० || जात्रतू अवस्थामें जो विमश ( संकल्प ) शून्य स्थिति हो जातो है वह समाधि ही क डी गयी है | विमशका अभाव ही तो समाधि कहलाता हँ ॥ ८६ उ०-८७ पू० ॥ अतः सुपुष्ति ओर वस्तुदशनके समय भी समाधि ता रहती ही है| किन्तु ये मुड्य ससाधि नहीं मानी जातों। इन अवस्थाओं में सेदका उल्लेख करानेवाल संस्कार लिपे रहते हैं, इसलिये इन्हें मुख्य समाधि नहीं साना जाता !। ८७ उ०--८८ || जञाशनत् अवस्थामें जो पदार्थ-दशेन है वह भी अविमशेरूप ही हे। तथापि में इसका स्पष्टतया वर्णन करता हूँ। मुनिपुत्र ! आदरपूवक सुनो ॥ ८६ ॥| सबसे पहले उत्पन्न हुआ जो अव्यक्त है वह नास्ति-सामान्यरूप है | कुछ भी नहीं है? इस प्रकार उसका भान अत्यन्त अभावरूप ही है ॥६०॥ पोडशोब<्ध्याय: । २३६ एपा सुपुप्तिरित्यक्ता जडशक्तिभवेचितः । दशने भासमान च नास्त्याभासपद॑ यतः ॥ ९१ ॥
"When it does not shine, then what indeed? By non-illumination also, the consciousness power shines."
Verse 92
अतः सुपुप्तिरर स्याजडदशनसड्भता । समाधो भासमाना या चितिः सा ब्रह्मरूपिणी ॥ ९२ ॥
"How does non-illumination appear? How does it not shine, tell me. If it shines, how does it shine? Consider this with subtlety."
Verse 93
भक्षिणी कालदेशानां नास्त्याभासविनाशिनी । सर्वथाउस्तिमयी देवी सुपुप्तिः सा -कथ्थ भवेत् ॥ ९३ ॥
"Here, all, even skillful scholars do not see. Without inner vision, deluded by this, they wander."
Verse 94
तस्मात् सुषृप्तिमात्रेण न भवेद्धि कृताथेता। वोधयामास जनक हइत्यश्टावक्रमुक्तिभि! ॥९४॥
"As long as vision does not remain by renouncing activity, so long, inner vision does not exist in any way."
Verse 95
"As long as one does not attain inner vision, so long, one does not see it. Inner vision should be desireless, how can that be with effort?"
Verse 96
5 का की तत्तद्रू पविभेदेन वित्तिनों. भिद्यते कचित् । गयी है ] उसके लिये वह सरल द्वे। और जो बहिमुख दृष्टिवाला ही है उसके लिये उसका ज्ञान अत्यन्त कठिन है ॥ १२-१३ पू० ॥ वास्तवमें तो वह पद एकदम अनिरवेचनीय और सबेथा अज्ञेय भी है। तथापि किसी प्रकार अन्य रूपसे उसका“निरूपण भी किया जाता है ओर उसे जान भी सकते हैं ॥ १३ उ०-१४ पू० ॥ तुम यहाँ जो-जो दृश्य देखते हो उस घट-पटादि दृश्यमें ज्ञान सामान्यरूपसे वह तत्त्व ही ज्ञेय कहा जाता है | तुम्हें जो कुछ भासता है उसपर शुद्ध बुद्धिसे विचार करो । जो भास्यपदाथंसे रहित भानशक्ति है बही तो सम्पूर्ण भानकी आश्रय है !'। १४ उ०--१५॥ मुनिपुत्र ! वही बह परमतस्त्व है--ऐसा तुम जानो | जो श्लेय पदाथ हे वही ज्ञान नहीं हो सकता, क्योंकि वह स्वयं प्रकाशित नहीं होता ॥९६॥
"Abandoning that properly, resort to your own nature. For a moment, relying on your own essence, without deliberation, then beyond."
Verse 97
"Considering through memory, then you know everything, unknowable and well-known, that is said to be the truth."
Verse 98
"Knowing thus the unknowable, one may attain the immortal state. This is all spoken to you, O sage's son, salutations be to you."
Verse 99
"I go, as this is not known by you through once hearing. This king, the best among the wise, will enlighten you."
Verse 100
"Ask again your doubts, the king will clear them all. Having said this, she was honored by the king and bowed by the assembly."
Verse 101
Like a cloud streak driven by the wind, it disappeared in a moment. This is explained to you, O Rama, the process of perception of the self.
Verse 102
Thus ends the fifteenth chapter named "Ashtavakra" in the revered Knowledge Section of Tripura Rahasya.
Key Takeaways & AI Summary
This chapter explores the profound teachings of The Elucidation of Mental Absorption and Liberation. It includes 102 verses detailing core themes like "", "", "".A sacred Shakta text revealing the supreme mystery of Tripura (the Divine Mother) — a dialogue between Dattatreya and Parashurama on consciousness, creation, and liberation.