The Utility of Wisdom for Liberation
(Chapter 17)
Chapter 17: On the Uselessness of Fleeting Samadhis and the Way to Wisdom
Verse 1
अशदशो-धष्यायः भागवत हि सा संविदेद्यवन्ध्या निरूपिता। उपलब्धविदशा तस्या बहुधा संश्रुत ननु ॥ १॥
Having heard thus from Janaka, Ashtavakra again asked the king. What he asked, I will tell you. Listen attentively, O descendant of Bhrigu.
Verse 2
अव्युत्पक््या न जानन्ति जना मायाविमोहिता। । सा दशा भाव्यते सह््मच्शैव नान्यथा क्चित् ॥ २॥
O king, you said that even in states of activity, there are subtle absorptions. Thus, tell me that clearly.
Verse 3
कि बहूक्तेन ते राम श्ृणु सार ब्रवीम्यहम् । मनसा वेद्यते वेद्य मनसोड्तो न वेद्यता ॥ ३ ॥
In which states are those absorptions of non-conceptual consciousness? Thus asked by him, the great king then said.
Verse 4
तथा च वेद्यनिप्ेक्त मनो<्य्यस्तीति सम्भवेत् । तन्श्नों. वेध्यनिमुक्तवित्तिरित्यभिधीयते ॥ ४ ॥
Listen, O sage, I will explain the absorptions in activities. When first embraced by the beloved, newly.
Verse 5
उपलब्धिस्वरूपत्वादिेदितिव हि. सा सदा। अन्योपलब्ध्यपेक्षायामान्ध्यं॑ स्पादनवस्थिते! ॥ ५ ॥
Then, the man does not know the external or internal for a moment. He remains not overpowered by sleep. That is called absorption.
Verse 6
जनक और अष्टावक्रके संवादका शेषभाग [ श्रीदत्तात्रेयजीने कहा--] परशुराम ! इस प्रकार मेंने उस वेद्यवस्तुविद्दीन शुद्ध संवितका निरूपण किया और तुमने व्यव॒हारमें उसकी उपलब्धिकी अनेकों अवस्थाओंके विषयमें भी सुना ॥ १ ॥ किन्तु मायामोहित पुरुषोंकों समझ न होनेके कारण उसकी पहचान नहीं होती | डस स्थितिका ज्ञान तो [ अन्तमुंख मनसे ] केबल सूक्ष्मदर्शियोंको ही होता हे, अन्य किसी प्रकार नहीं ॥ २॥ परशुराम ! अधिक कहनेसे क्या लाभ ? सुनो, में सार बात बतलाता हूँ। मनसे तो दृश्य पदार्थ जाने जाते हैं, इसलिये मन दृश्य नहीं है ॥ ३॥ परन्तु दृश्य न रहनेपर भी मन रहता हे--यह् भी निश्चय हे | बस, वह वेद्यविहीन मन ही शुद्ध संवित्! कहा जाता हैं. | ४ ॥| वह ज्ञानस्वरूप है, इसलिये सवेदा प्रकाशमान ही है। यदि उसकी उपलब्धिके लिये किसी अन्यकी अपेक्षा मानी जाय तो [ उस अन्यके लिये उससे भिन्नकी और उसके लिये उससे भिन्नकी अपेक्षा होगी ] इस प्रकार अनवस्था दोष उपस्थित होगा और फिर [ कोई स्वयंप्रकाश तत्त्व न रहनेके कारण ] सर्वत्र अन्धकार ही शेष रहेगा [ अधीत् किसी भी बस्तुका ज्ञान नहीं हो सकेगा )॥ ५॥ २६० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे किश्विडद्भधावं हि. संपश्यनज्न भासि किसमु भार्गव । न भासि चेन्न त्वमसि ततः प्रश्नस्तु ते कथय ॥ ६ ॥
When something long desired, determined as unattainable, is suddenly attained, O sage.
Verse 7
अहो स्वयं खषुष्पात्मा सन् कर्थ हि तमिच्छसि । कथ्थ तवात्मानमह साधयामि विभायय ॥ ७॥
Then, the man does not know the external or internal for a moment. He remains not overpowered by sleep. That is called absorption.
Verse 8
सामान्येन विभान्तं मां न जीनामि विशेषतः । इति चेद्राम सामान्यमेव ते रूपमव्ययम् ॥ ८ ॥
Unexpectedly going somewhere, fearless with a delighted mind, if suddenly sees a tiger, etc., like death.
Verse 9
विशेषलेशरहितमेतावद्ययेय ते वषु। । अहो जानन्नपि पुनरलं मुद्यसि वें बृथा ॥ ९॥
Then, the man does not know the external or internal for a moment. He remains not overpowered by sleep. That is called absorption.
Verse 10
भासक॑ स्वेमपि च विशेषविषयं भवेत् । अतः सामान्यरूपस्त्व॑ विभासि स्वत एवं हि ॥ १०॥
When very dear, one's own son, etc., the lord in household duties, suddenly hears as dead, indeed.
Verse 11
शरीराद्यात्मना भासि चेच्छणु प्रत्रवीमि ते। न त-.. भगुनन्दन ! किसी भी पदाथको देखते समय क्या तुम्हें अपना भान नहीं होता ? यदि नहीं होता तो तुम हो ही नहीं, फिर प्रश्न किस प्रकार करते हो १॥ ६ ॥ अजी ! यदि तुम आकाशकुसुमके समान अलीक हो, तो फिर तुस अपनेको जानना क्यों चाहते हो ? सोचो तो, फिर में तुम्हारे स्वरूपको सिद्ध ही केसे कर सकता हूँ ? ॥| ७॥ यदि कहो कि में सामान्यरूपसे तो भासता हैँ परन्तु विशेषरूपसे अपनको नहीं जानता, तो यह सामान्य ही तो तुम्हारा अविनाशी स्वरूप है ॥ ८॥ जिसमें किसी प्रकारके विशेषका लेश भी नहीं हे वही तुम्हारा स्वरूप है | आश्चय है, कि इसप्रकार अपनेको जागते हुए भी तुम व्यर्थ ही अममें पड़े हुए हो ॥ ६ ॥ ह सबको प्रकाशित करनवबाला ज्ञान भी विशेषविपयक होता है। अतः तुम तो केवल सामान्यरूप हो और स्वयं ही प्रकाशमान हो ॥१०॥ यदि कहो कि में शरीरादिरूपसे भासता हूँ, तो सुनो में बतलाता १. घट-पट झादि विपयोंको प्रकाशित करनेवारा ज्ञान उन अपने भास्य विषयेकिे द्वारा निरूपित होता है, इसलिये घटज्ञान-पटकज्ञान आदि रूपसे वह विशेषविषयक कहा जाता है। स्वरूपभूत शुद्ध ज्ञान तो विष्यविवजित है। अतः वह ज्ञानासामान्य है और ज्ञानमात्र होनेके कारण स्वयंप्रकाश द्वी है । अष्टादशोध्ध्यायः | २६१ शरीरात्मतया भासि सह्डूल्पेनेव नान्यथा ॥ ११॥
Then, the man does not know the external or internal for a moment. He remains not overpowered by sleep. That is called absorption.
Verse 12
विभावय सक्ष्मरशा सह्डल्पेन्यस्य देहतः। भाति कि तब देहत्वं देहस्तच्चापि ते भवेत् ॥ १२॥
Now, I will also tell otherwise the origin of absorption. Listen, there are absorptions in between waking, dreaming, and deep sleep.
Verse 13
एवं सड्ूटप्यते यद्यच्छरीर॑ तत्तदेव हि। तेन स्वमयसत्वं स््याः कथं देहात्ममात्रकः ॥ १३॥
Seeing something at a distance with a one-pointed intellect, O sage, the mind goes into an elongated state like a leech on the blades of grass.
Verse 14
तस्माद् दृश्यं तव वपुने हि स्याइयमिचारतः । तस्माद् दृडमात्ररूपो5सि न दृग् दृश्या कदाचन ॥ १४ ॥
In the body, consisting of the appearance of the body, and in the state of feeling, likewise, in between, observe the mind always in the state called non-conceptual.
Verse 15
सा स्वप्रभा द्श्यरूपविशेषलेशवजिता । देहदेशकालभेदचित्रवेचित्र्यचित्रिता ॥ १५ ॥
What is the use of many words here? Listen, O subtle examiner, in activities, the knowledge of anyone does not shine as one.
Verse 16
तस्मात् स्डूल्पमात्रस्य वजनात् परतः स्थितम् । शेप॑ शझुद्धचिते रूप स्वात्मानपुपलक्षय ॥ १६ ॥
This activity consists of fragmented knowledge and groups. Therefore, all philosophers indeed describe it as such.
Verse 17
हूँ। शरीरादि रूपसे तो तुम शरीरादिका संकल्प होनेपर ही भासते हो; स्वतः नहीं ॥ ११॥ सूक्ष्म दृष्टिसे विचार करो, जब तुम्हें देहसे भिन्न किसी अन्य वस्तुका संकल्प होता हैं तब क्या तुम्हें अपनी देहरूपता भासती हैं ? [ यदि शरीरके साथ सम्बन्ध भासनेके कारण ही तुम शरीरको अपना स्वरूप मानते हो ] तब तो सम्बन्ध होनेके कारण वे अन्य पदार्थ भी तुम्हारे शरीर सिद्ध होंगे ॥ १२ ॥ इस प्रकार तो तुम्हारे द्वारा जिस-जिसका संकल्प होगा बह्दी तुम्हारा शरीर सिद्ध होगा | इस तरह तो तुम सबेस्वरूप हो जाओगे फिर केवल एक शरीरमात्र केसे रहोगे ? ॥ १३॥ अतः कोई भो दृश्य तुम्हारा स्त्ररूप नहीं हो सकता, क्योंकि वह परिवरतनशील होगा | इसलिये तुम ज्ञानमात्र हो ज्ञानके विषय कभी नहीं ॥ १७ ॥
The self or intellect, divided by moments, stands in the state of non-conceptuality in the stream of those moments.
Verse 18
अष्टादश अध्याय ॥ १८॥
O son of Kahola, know that for the knowers, there is absorption every moment. For another, absorption is like the horn of a rabbit.
Verse 19
वह स्वरूपभूत ज्ञान स्वयंप्रकाश है; उसमें ज्ेयरूप विशेषका लेश भी नहीं हे तथा [ सबका आश्रय होनेके कारण ] बह देह, देश ओर कालभेद रूप चित्रकी विचित्रतासे अंकित है ॥ १४ ॥ अतः संकल्पमात्रके व्यागने पर जो सबसे अतीत शुद्ध चेतनका स्वरूप शेप रह जाता है उसीको तुम अपना आत्मा जानो ॥ १६॥ २६२ त्रिपुरारह स्ये ज्ञानखण्डे एवं सकृछक्षिते तु यत् स्थितं तदलक्षणात् । अज्ञानं | सर्वसंसारकारणं_ तहिलीबते ॥ १७ ॥ न मोक्षो नभसः पृष्ठे न पाताले न भूतले। सड्डल्पवजनाच्छुद्धस्थरूपस्प. अथेच. सः॥ १८॥ स स्वरूपात्मकत्वात्तु ना5प्राप्तः स्यात् कदाचन । केवल मोहमात्रस्य निरासेन कृता्थता ॥ १९ ॥
Having heard thus said by Janaka, the sage again asked, "O king, is absorption non-conceptual in activity?"
Verse 20
अन्यो मोक्षो न सम्भाव्यः क्रतकत्वाद्विनाइ्यते । स्व॒रूपादतिरिक्तश्रेच्छशश्ृद़्समोी हि. सः ॥ २० ॥
If that is for everyone, how would there be transmigration? In deep sleep and perception, appearing inert and indistinct.
Verse 21
स्वरूप सबेतः पूर्णमन्यो मोक्षः क् सम्भवेत् । स्वरूपे सम्भवन् मोक्षो देणप्रतिबिम्बवत् ॥ २१ ॥
The accomplishment of human goals is indeed through non-conceptual absorption, where the pure consciousness shines as the self. How then can there be transmigration again?
Verse 22
लोके5पि बन्धविगमादते मोक्षो न भावितः विगमो5भाव एव स्यात् सत्यों भावात्मकः कथम् ॥ २२ ॥
This knowledge is indeed the destroyer of the family of ignorance, called non-conceptual absorption, which is the cause of the highest good.
Verse 23
इस प्रकार जब एक बार उसे लख लिया जाता है तो उसमें जो देहादि भासते द्वें उनपर दृष्टि न रहनेके कारण सम्पूर्ण संसारका कारण जो ज्ञान है वह लीन हो जाता है॥ १७॥ मोक्ष न आकाशकें ऊपर है, न पाताल या भूतलमें हे। बस, संकल्पत्यागके द्वारा जो झुद्धस्वरूपमें स्थिति है बही 'मोक्ष' है || १८ ॥| .._ ह स्वरूपभूत ही है, इसलिये कभी अग्राप्त भी नहीं हे | केबल भाहसात्रका त्याग होनेपर ही कंतकृत्यता हो जाती है | १६ ॥ इसके सित्रा कोई और सोक्ष होना सम्भव नहीं है, क्योंकि वह ऊतक ( क्रियासाध्य ) होनेके कारण नष्ट हो जायगा । और यदि बह स्वरूपस भिन्न हुआ तो खरगोशके सींगोंके समान अल्लीक ही होगा ॥ २० ॥ अन्य मो. तो सभी ओर” परिपूर्ण हे, फिर उससे भिन्न कोई हा तो ४ कहाँ हो सकता है ? यदि उसे स्व॒रूपमें ही माना जाय तब रा पह द्पेणमें प्रतिबिम्बके समान उससे अभिन्न ही होगा ॥२१॥ न सी सनकी निवृत्तिके सिवा सोक्ष और कुछ नहीं माना गया | और 'निव्वत्ति! अभावरूप ही होती है, अतः अभावात्मक बन्धनिवृत्ति सत्य ( भावरूप ) केसे हो सकती है ? ॥ २२ ॥ अष्टादशोष्ष्यायः | २६३ भावाभावात्मक वस्तु न हि सम्भवति क्चित् तथा च स्वाप्नभावाश्व॒ भावाभावोभयात्मका; ॥ २३ ॥
"O king, tell me this, the destroyer of all doubts," thus asked, the king said to the sage.
Verse 24
सत्याः स्थुवॉधहेतोस्ते त्वसत्या इति चेच्छणु । वाधो5्भाषप्रत्ययः स्यात् प्रत्ययाभावकालिकः ॥ २४ ॥
Listen, O sage, I will tell you this supreme secret. From ignorance, this transmigration has arisen from beginningless time.
Verse 25
यस्येवं वाधयोगः स्यात् सोड्सत्यो न हि चेतरः । अस्ति स्वस्थ दश्यस्य बाधोड5प्रस्ययकालिकः ॥ २५ ॥
The appearances of pleasure and pain are established by the nature of flow, like a dream, continuously experienced by all, always.
Verse 26
तस्मादसत्यमेव स्यात् भावाभावात्मना स्थितम्। यस्याभावस्पशेलेश!ः कदाचित् कुत्रचिन्नहि ॥ २६ ॥
The cessation of that is understood to be from knowledge alone. That knowledge may be conceptual, which removes ignorance.
Verse 27
एवंविधन्तु चित्तत्त्वं सत्व॑ सवोत्मना स्थितम् । तस्मादविभिन्रमोक्ष स्तु न सत्यः स्थात् कथश्वन ॥ २७ ॥
Ignorance is not removed by non-conceptual knowledge alone. Non-conceptual knowledge is not opposed by anyone.
Verse 28
. मोक्ष: पूणस्वरूपस्य सकृत् प्रथनमुच्यते । चेत्यवजनमात्रेण चितिः पूणों प्रकीत्तिता ॥ २८ ॥
Together, non-conceptual knowledge, supported by conceptual, is well-established like a wall for varied appearances.
Verse 29
चेत्याभासनमेवास्याशितेः सझ्लोच्न भवेत्। किसी भी वस्तुका भावाभावात्मक ( सत्य और असत्य उभयरूप ) होना तो कभी सम्भव ही नहीं हे। यदि कहो कि स्वप्नके पदाथे तो भावाभाव उभयरूप ही हैं, क्योंकि उपलब्ध होनेके कारण वे सत्य हैं और जाग्रत्कालमें बाधित हो जानेके कारण असत्य भी हैं, तो सुनो--। २३--२४ पू० ॥ पदार्थंकी प्रतीति न होनेके समय जो उसकी अभावात्मिका प्रतीति होती है उसका नाम बाध है। जिसका इस प्रकार बाधसे सम्बन्ध रहता है वह पदार्थ असत्य होता है, अन्य नहीं ॥ २४ उ०-२५ पू० ॥ यह अप्रतीतिकालिक बाघ सभी दृश्यवगंका होता है, अतः भावाभावात्मक रूपसे स्थित सारा दृश्य असत्य ही है ॥ २५ उड०-२६ पू० ॥ किन्तु जिसे कभी किसी अवस्थामें अभावका लेशमात्र भी स्पशे नहीं होता ऐसा चेतनतत्त्व तो सब प्रकार सत्य ही हूँ । उससे भिन्न जो मोक्ष- होगा वह किसी प्रकार सत्य नहीं हो सकता || २६ उ०-२७ ॥ डस पुणस्त्ररूपका निरन्तर स्फुरण ही मोक्ष कहा जाता है। चेत्य पदार्थके त्यागमात्रसे चेतन पूर्ण कहा जाता है ॥ र८ ॥ चेत्य पदार्थोका भासना ही चेतनका संकुचित होना है। जकं २६४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे चेत्याभाने चितिः पूर्णा परिच्छेदविवजनात् ॥ २९ ॥
Non-conceptual knowledge alone is called knowledge. Indeed, due to the mentioning of concepts, it becomes conceptual.
Verse 30
कालादिभिः परिच्छेदो यदि तस्या निरूप्यते । अचेतितः परिच्छेदरवेतितों वा भवेद्वद ॥ ३० ॥
Ignorance, known as conceptual knowledge, is indeed not otherwise. That is established as various kinds of cause and effect.
Verse 31
अचेतने ह्मसिद्धः स्याच्चेतने सेव व्यापिका। लोके कालपरिच्छिन्नो भावो यः कोडपि भातवित३ ॥ ३१ ॥
The cause is declared to be known as the fullness of one's own self. The conscious self may indeed be complete due to the absence of limitation.
Verse 32
भावकालो .परिच्छेद्यपरिच्छेदकतां गतो। चिता व्याप्तों भवेतां वे यदा .तहिं तथाविधों ॥ ३२ ॥
The adept is indeed of the absence of limitation of parts and so forth. The knowledge of such a self is established as incompleteness.
Verse 33
अव्याप्ती तु चिता यहिं कथ॑ं सिद्धयेत् परिच्छिदिः । चितेबंहियंदा चेत्यमस्ति तत् स्यात् परिच्छिदिः ॥ ३३ ॥
Here now, in the form of 'I am', that root ignorance may indeed be. The appearance of body-self and so forth is in the form of a sprout of that.
Verse 34
चितेबहिश्रेत्यसिंद्धिी सवेथा. नोपपद्यते । चेत्यका भान न रहे तो परिच्छेद न रहनेके कारण चेतन परिपूर्ण ही हैं ॥ २६ ॥| यदि कोई कहे कि कालादिके द्वारा उसका परिच्छेद हो सकता है, तो बताओ कि वह परिच्छेद चेतनसे अप्रकाशित होगा अथबा प्रकाशित १ ॥ ३० ॥ यदि बह चेतनसे अग्रकाशित होगा तब तो डसकी सिद्धि ही नहीं हो सकती ओर यदि प्रकाशित होगा तो बह व्यापक चेतन ही होगा लोकमें जो भी पदार्थ कालपरिन्छिन्न माना जाता हे उसमें एः ओऔ रिच्छेय ञ उस पदाथ ओर कालका परिच्छेद्य-परिच्छेदकरूप सम्बन्ध रहता है । किन्तु वे पदार्थ और काल दोनों ही चेतनसे व्याप्त रहते हें तभी वे उस रूपमें भासते हैं | ३९-३२ ॥ हि यदि बे चेतनसे व्याधत्ष न हों तो उनका परिच्छेद भो केसे सिद्ध होगा ।[ तथापि चेतन तो व्यापक ओर अद्वितीय है, ] क्योंकि उसका परिच्छेद तो तभी हो सकता है यदि उससे बाहर कोई चेत्य पदार्थ हो ॥ ३३ ॥ किन्तु चेतनसे बाहर तो चेत्यकी सत्ता किस्री प्रकार सिद्ध नहीं 'चेतनसे व्याप्त न होने! का अथ है चेतनसे प्रकाशित न द्वोना । जो वस्तु, भाव या सम्बन्ध चेतनसे प्रकाशित न हो उसका भान किसे होगा ओर किसौंको भी भान न दोनेपर उसकी सत्ता केसे सिद्ध होगी ? अष्टादशो 5ध्यायः । २६४५ यो बहिः स कथं सिद्धयेचितिसम्बन्धजितः ॥ ३४ ॥
The cessation of ignorance does not lead to the end of transmigration. Indeed, ignorance does not cease without complete self-knowledge.
Verse 35
म्बन्धोषपि नेकदेशः स्यादसिद्धस्तथेतरः तत्सम्बन्धांशमात्रस्य भानादन्यन्न सिद्धवति ॥ ३५॥
That complete self-knowledge is well-established as of two kinds: indirect and direct. The indirect comes from teacher and scripture.
Verse 36
अतो बहिः पदार्थोषपि चितिनिमंग्न इष्यताम् । एवं च स्वोत्मनैव मग्न॑ चेत्यमपीष्यताम् ॥ ३६ ॥
It is established that direct knowledge is not the cause of human goals. Your knowledge may be as arising from scripture and hearing.
Verse 37
कथ्थ॑ स्वान्तर्विनिमेग्न॑ स्वपरिच्छेदक॑भवेत् । चेत्यमेबंबिध॑ राम विचारवसुयुक्तित। ॥ ३७ ॥
Knowledge obtained merely by faith is not said to yield fruit. Direct knowledge indeed arises from the maturation of absorption.
Verse 38
चितेरन्तभासमानं. प्रतिबिम्बात्मकं॑ भवेत् । न भावोदरगो5ष्मावों भवन् लोक सुच्छयते ॥ ३८ ॥
Absorption, not obstructed by ignorance with elaboration, certainly yields auspicious fruit. Absorption preceded by knowledge indeed produces knowledge.
Verse 39
भावानां स्याद्धि साइये तथा चेद्राम सबेतः । वहिः पदा्थेस्ते प्रोक्तो श्रममूलो हि सबेधा ॥ ३९ ॥
Therefore, no benefit arises in absorption for the ignorant, just as seeing an unknown ruby in a box.
Verse 40
तदाश्रयाणां भावानां कथ्थ स्थात् सत्यता वद। चितिस्वरूपः स्वात्मेव तत्तद्भावात्मना सदा ॥ ४० ॥
Just as another person, having seen a gem known by hearing somewhere, immediately recognizes it.
Verse 41
हो सकती; क्योंकि चेतनसे सम्बन्ध न रखकर जो पदाथ उससे बाहर होगा उसकी सिद्धि केस होगी ? ॥ ३४ ॥ वह चेत्य ओर चेतनका सम्बन्ध भी एक देशमें नहीं माना जा सकता | यदि ऐसा माना जाय तो चेत्यके अन्य अंशकी सिद्धि नहीं हो सकती | उस सम्बन्धित अंशमात्रका भान होनेसे ही अन्य अंश तो सिद्ध नहीं हो जाता ॥| ३५ ॥ अतः बाह्य पदार्थॉको भी चेतनमें डूबे हुए समझो | इस प्रकार चेत्यबगेको भी सबंधा चेतनके गर्भमें ही अनुभव कणे ॥ ३६ ॥ जो चेत्य अपनेमें ही निमम्न हे वह अपना ही परिच्छेदक केसे हो सकता हे ? हे परशुराम ! इस प्रकार युक्तिपूवक विचार करो ॥३७॥ जो वस्तु चेतनके भीतर भासती है वह प्रतिबिम्बरूप ही हो सकती है, क्योंकि लोकमें किसी एक पदाथके भीतर रहनेवाला दूसरा पदाथ देखा नहीं जाता ॥ ३८५ || परशुराम ! याद उसा साना जायगा तब ता सबत्र पदाथका घोटाला हो जायगा | यह बात पहले कही ही जा चुकी ढे कि बाह्य पदाथ सबधा श्रममूलक हें। तो बताओ, उस बाह्याभासके आश्रित रहनेवाली बस्तुओंकी सत्यता केसे सिद्ध हो सकती है ? ॥३६-४० पू०।॥ २६६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे भासते स्वाच्लन्यशक्त्या नाधिकं विद्यते क्चित् | इति वाक्य समाकण्य पुनः पप्रच्छ भागंवः ॥ ४१ ॥
Even if one is very skilled, if not devoted, one may see a gem somewhere again and again without recognizing it, O sage.
Verse 42
भगवन् भवता प्रोक्त दुधे्ट प्रतिभाति में। शुद्धा चितिडिचित्रका भासते इत्यसम्भवात् ॥ ४२ ॥
Similarly, deluded ones do not find the fruit based on knowledge. Even the learned, if ignorant, do not recognize it.
Verse 43
चितिश्रेत्यमिति द्वेधा वस्तु सर्वेिभावितम् । तत्र चेत्यं चिता भास्य॑ स्वश्नमा चितिरस्तु वे ॥ ४३ ॥
Due to not being devoted, they do not recognize at all, just as one does not recognize a star even when seeing it.
Verse 44
यथा लोकभातमपि वस्तु तड्धिन्नमस्ति वे। एवं चिता भासितं तु चेत्यमस्तु प्रथमविधम् ॥ ४४ ॥
The deluded, devoid of heard knowledge, even if endowed with it, indeed, do not recognize even if they see, due to the absence of devotion.
Verse 45
One who, having heard about the Venus star by the characteristics of direction and form, determines that it should be known by them in every way, is a wise man devoted to that.
Verse 46
चेत्यं चिदात्मकृमिति नानुभूति समारुहेत् । अथ च पग्रागभिहितं जनकेन महात्मना ॥ ४५ 0 सड्रल्पवजनादेव निर्विकल्प॑ मनो भवेत् । तदेव निर्विकल्प॑ स्थाज्ज्ञानं संसारनाशनम् ॥ ४६ ॥
With a focused mind, one will recognize it clearly. Thus, due to ignorance and lack of devotion, the deluded ones do not recognize it.
Verse 47
अतः चेतनस्वरूप अपना आत्मा ही अपनी स्वातन्श्यशक्तिक द्वारा उस-उस बस्तुके रूपमें सदा भास रहा है। उससे भिन्न कुछ भी नहीं है ॥ ४० उ०-४१ पू० ॥ दत्तात्रेयजीका यह उपदेश सुनकर परशुरामजीने फिर पूछा-“भ्रगवन् ! आप जो कुछ बता रहे हैँ वह तो मुझे असम्भव-सी बात जान पड़ती है। एक शुद्ध चेतन ही अनेक रूपमें भास रहा हे--ऐसा तो हो नहीं सकता ॥ ४१ उ०-४२॥ चेतन ओर त्ेत्य--ये तो सभीने दो तत्त्व माने हैं। इनमें चेत्य चेतनसे भासित होता है, “अतः चेतनका स्वयंग्रकाश होना तो ठीक हेँ !। ४३॥ लोकमें जिस प्रकार भासित होनेवाली वस्तु भासकसे भिन्न होती है वेसे ही चतनसे भासित चेत्यका उससे प्रथक होना भी उचित ही हे। किन्तु चेत्य चेतनस्वरूप दे“यह बात तो अनुभवमें नहीं आती ।| ४४-४४ पू० ॥ इसके सिवा महात्मा जनकने जो पहले कहा कि संकल्प त्याग देनेसे ही मन निबव्रिकल्प हो ज्ञाता हैं। यही संसारकी निवृत्ति करनेवाला निर्विकल्प ज्ञान हैं ओर यही आत्माका भी स्वरूप हें- अष्टादशो5ध्याय: | २६७ तदेव ह्यात्मनो रूपमित्युक्त तत् कर्थ भवेत् । आत्मनों हि मनः प्रोक्त करणं ज्ञानकर्मणि ॥ ४७ ॥
They do not recognize their own self in the presence of absorptions, O sage, wandering for alms due to bad luck, just as one who has forgotten his treasure.
Verse 48
मनो यद्यात्मनो न स्याहिशिष्येत जडात् कथम् । मनो जडाद्विशिपः स्यादात्मनो भगवन्ननु ॥ ४८ ॥
Therefore, all these states of absorptions are purposeless. Indeed, for children, the non-conceptual state is always present.
Verse 49
No fruit is yielded from the non-removal of ignorance, O sage. Knowledge, which is based on recognition, may be conceptual.
Verse 50
मनसेव हि वन्धः स्यान्मोक्षो वाउप्यात्मनः स्फुटम् । सविकलपं मनो बन्धो मोक्षः स्यान्निर्विकल्पकम् ॥ ४९ 0 तत् कथं मन एवात्मा करणं हि मनः स्मृतम्। निर्विकल्पस्थ संसिद्धावषि द्वतं तु शिष्यते ॥ ५० ॥
That indeed removes the ignorance, the root of transmigration. Pleased by acts in many births, the self-deity becomes satisfied.
Verse 51
अथापि लोके दृष्टोइस्ति यस्य भ्रान्तिरसन् हि सः । न हि भ्रान्तिर्सत्या स्यात्तदद्वेत कथं भवेत् ॥ ५१ ॥
Then the desire for liberation arises, it does not arise otherwise, even in millions of ages. Awareness in births is supremely rare.
Verse 52
अर्थक्रिया न क्चिच्च दृष्टा सत्येन वस्तुना। सो ऐसा केसे हो सकता है, क्योंकि ज्ञानरूप क्रियामें मन तो आप्माका करण कहा गया है ॥ ४४ उ०-४७॥ यदि आत्माके पास मन न हो तो जडवगंसे उसका अन्तर केसे होगा ? भगवन् ! आत्माका जो जडव्गंसे भेद हे उसका कारण मन ही तो हे ॥ ४८ || तथा यह भी स्पष्ट हे कि मनके कारण ही आत्माके बन्धन ओर मोक्ष होते हँ। सविकल्प मन ही आत्माका वन्धन है और निर्विकल्प ही उसका मोक्ष है ॥ ४६ ॥ ऐसी अबस्था में मन ही आत्मा केसे हो सकता है ? मन तो उसका करण ही माना गया है। अतः निर्विकल्प मन मोक्षमें कारण हो भी तो भी [ आत्मा और मन-यह ] द्वैत तो रहता ही है ॥| ४० ॥ लोकमें यह भी देखा गया है कि जिस बस्तुकी श्रान्ति होती है वही असत्य होती हे । स्वयं भ्रान्ति तो असत्य नहीं होती । ऐसी अवस्था में द्वेतका अभाव केसे हो सकता है ॥ ४१ ॥ जो बस्तु असत्य होती हे उसके द्वारा कभी व्यवहार होता भी 4. तासपर्य यह कि जेसे रज्जुमें सपंकी आन्ति द्वोती है तो उसमें सर्प ही असत्य होता है, आन्ति होने की घटना तो असत्य नहीं होती। अतः द्वेतका स्वधा अभाव तो नहीं हुआ । २६८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सर्वे हि जागतं॑ वस्तु स्थिरमथक्रियाकरम् ॥ ५२ ॥
Very rare among them, indeed, is human birth in every way. Even there, subtle intellect is extremely rare.
Verse 53
तदसत्यं कथ्थ त्रृहि यतोउद्वेतं प्रसिद्धयति । सव॑ च आन्तिविज्ञानं आन्त्यश्रान्तिभिदा कथम् ॥ ५३ ॥
See, O sage, among the immobile beings, even a hundredth part is considered. Indeed, among them, the mobile beings are not seen as even a hundredth part.
Verse 54
आन्तिः सवसमा वापि कथ॑ स्याद् ब्रहि में गुरो । सन्देह एप विरतो हृदि में परिवत्तते ॥ ५४ ॥
There is no equal humanity, even there, consider. Millions of humans are seen like animals.
Verse 55
इत्येय॑ प्रश्नमाकण्य॑ दत्तात्रेयः समस्तवित् । साधुप्रश्नप्रहष्टात्मा प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥ ५५ ॥
Those who do not know good and bad, virtue or sin, others also, millions of mortals, are engaged and engrossed in desires.
Verse 56
राम साधु त्वया पृष्ट प्रोक्तप्रायमिद॑ पुनः । यात्रत्ष मनसस्तोषस्तावद्ू भूथों विशोधयेत् ॥ ५६ ॥
Delighting in the coming and going, proud of the semblance of wisdom, among such people, but some are wise ones.
Verse 57
गुरुवोपि कथं बत्रयादप्ष्टस्तन्मनोगतम् । प्राणनां हि बुद्धिभेदात्तक:ः एथगवस्थितः ॥ ५७ ॥
With minds full of impurity, they also are disbelievers in the non-dual state. Covered by the divine illusion, they do not perceive the non-dual supreme state.
Verse 58
अपृष्ठा स्वस्वाउइभिमतं कः सन्देहाद्विम्नुच्यते । नहीं देखा गया | किन्तु संसारके सब पदार्थ तो स्थिर हैँ और उनके द्वारा व्यवहार भी चल रहा है ॥ ४२॥ बताइये, वें असत्य केसे हो सकते हैं, जिससे कि अद्गैतकी सिद्धि हो । यदि सारा ज्ञान श्रान्तिरूप हे तो इसमें भश्रान्ति और अश्नान्तिका भेद भी केसे होगा ? ॥ ५३ ॥ साथ ही, गुरुदेव ! यह भी बताइये कि यह श्रान्ति सबको समान रूपसे क्यों भासती हे? मेरें हृदयमें यह बड़ा भारी सन्देह चक्कर काट रहा है?” ॥| ४४ || ऐसा प्रश्द सुनकर सर्वेज्ञ दत्तात्रेयजीकों इस सुन्दर प्रश्नके कारण बड़ी प्रसन्नता हुई ओर उन्होंन कहना आरम्भ किया-२]॥ #* ॥ “परशुराम ! तुमने सुन्दर प्रश्न किया। ये बातें प्रायः कही जा चुकी हैं | तथापि ज़बतक अपने मनको सन्तोप न हो तबतक बारबार उनपर विचार करना ही चाहिये ॥ ४६ ॥ यदि पूछा न ऊाय तो गुरु भरी शिष्यके मनमें छिपे सन्देहके विपयमें किस प्रकार कह सकते डूँ। प्राणियांकी बुद्धियाँ अनक प्रकार की हें, अतः उनके समाधानके लिये युक्तियाँ भी अलगअलग हैँ ॥ ४७॥ ' अत: अपने-अपने आशयके विपयसरें प्रश्न किये बिना भला कोन अष्टादशोधथ्याय: । २६६ प्रष्ठुबिद्या हि सुदृढा ग्रइनो बीज निरूपणे ॥ ५८ ॥
How can that state be attained by all, by those blinded by illusion, by the unfortunate? Indeed, the intellect of those blinded by illusion does not ascend to that state.
Verse 59
अप्रष्डनेंव विद्या स्थात् पृष्ठा विद्यात्ततों गुरुम । चितिरंकेव वचित्याद्भधाससतोे इति सम्भवेत् ॥ ५९॥
Others, with bad fortune, even if intellectually advanced, here, who with false notions, again are denied by wrong imaginations.
Verse 60
एकरूपो यथा5षदशः प्रतिबिम्बादनेकथा । पश्य स्वाप्नविकल्पादों मन एक हि केवलम् ॥ ६० ॥
Alas, the divine illusion, even seeing the great state, the wish-fulfilling gem in hand, they abandon indeed by wrong imaginations.
Verse 61
द्रएदशनच्य्यात्मवचित्येण विभाति हि। एवं शुद्धव सा सबिद्विचित्राकारभासिनी ॥ ६१ ॥
Those whose self-deity is pleased by worship, they are liberated from illusion, endowed with good reasoning and faith.
Verse 62
चितिश्रेत्यमिति द्रथा स्वप्नेषपि हि विभासते। आलोकमन्तरा त्वन्धो भाव॑ जानाति वे ननु ॥ ६२॥
Established in non-duality, they attain the supreme state. I will explain the sequence to you, O sage, listen attentively.
Verse 63
अन्धस्याभासमानश्व रूप॑ भाति स्मृतों किल । नव चितेरभाने कि कदा कुत्र विभासते ॥ ६३ ॥
Devotion to the deity is obtained by the merits of countless births. Worshipping for a long time, by that grace, thereafter.
Verse 64
[ इसमें अन्य सभीका अभाव है ] इसलिये यह व्याबृत्ति सब प्रकारके परिच्छेदसे शून्य होनेके कारण भेदके स्परशमें रहित है; क्योंकि द्पेणमें प्रतिबिम्बित नगरके समान सब कुछ इसीमें भास रहा है ॥ ६४ ॥
Attains disinterest in the objects of enjoyment and devotion to that, through dispassion and devotion, and associated with faith.
Verse 65
हसे छूट सकता है? विद्या तो पूछनेवालेकी ही पक्की होती है, वास्तवमें प्रश्न ही निरूपणका बीज है'। जो प्रश्न नहीं करता उसे विद्या ( ज्ञान ) प्राप्त नहीं होती, अतः प्रश्न करके ही गुरुदेवसे विद्या प्राप्त करनी चाहिये ॥ ४८-४६ पू० ॥ एक ही चेतनय अनेकरूपोंमें भ्गस रहा हे--यह बात इसी प्रकार सम्भव हे जसे दर्पण एकरूप होनेपर भी प्रतिबिम्बके कारण अनेकरूप जान पड़ता है ॥ ४६ उ०-६० पू० ॥ देखो, स्वप्न और मनोराज्य आदिमें केवल एक ही मन द्रष्ट; दशन और दृश्य आदि अनेक रूपोंमें भासता ही हे। इस्ती प्रकार वह संवित् शुद्ध होनेपर भी अनेक रूपोंमें भासनेवाली है। स्वप्नमें भी चिति और चेत्य-ये दो भेद भासते ही हैं | [ यदि यह द्वेत स्वप्नमें मिथ्या है तो जाग्मतभें क्यों नहीं है ? ]॥ ६० उ०-६२ पू० ॥ [ तुमने कहा कि प्रकाश और घटादिके समान भासक और भास्य दोनोंहीकी सत्ता है, सो यह बात नहीं हे, क्योंकि घटादि तो नेत्र या प्रकाश न होनेपर भी अन्य घाघनोंसे भास जाते हैं; जेसे--] अन्धा, आदमी प्रकाश न होनेपर भी बस्तुओंको स्पशादिके द्वारा जान ही लेता है तथा अन्धे आदसीकी रूपका भान न होनेपर भी स्मृतिमें उसका भान होता ही हैं; किन्तु चेतनके विषयमें ऐसी बात नहीं है, चेतनका भान न होनेपर भला कब किसीको कहीं किसी बस्तु का भान हुआ हैं ? ॥ ६९२ 3०-६३ ॥ २७० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे यथा55दश विना किश्वित् प्रतिविम्ब॑ न भाति वे। आदशान्नातिरिक्तोउतः प्रतिब्रिम्मो भवेद्यथा ॥ ६४ 0 एवं चितिम्रते किश्विदतिरिक्त न विद्यते। अतएव मनो5प्यन्यत् सबेथा नास्ति वें चितेः ॥ ६५ ॥
Having attained the true guru, by his instruction, one knows non-duality, the supreme state. This knowledge is indeed indirect, for non-duality exists thus here.
Verse 66
यथा स्वप्ने मनस्तद्वज्जाग्रत्यपि मनो न हि कल्पित॑ कायसंसिद्धयें करणं केवल मनः ॥ ६६ ॥
Then, properly contemplate non-duality, the self-deity, by establishing with sound reasoning and dispelling doubts.
Verse 67
यथा स्वाप्नः कुठारः स्यात् करणं तरुछेदने । राम द्रिय्याउसत्यरूपा सत्य तत् करणं कथम् ॥ ६७ ॥
Then, having firmly established the principle of the self, non-dual, with respect, meditate directly with determination and effort.
Verse 68
असता नरथज्भरेण का कदा सुविदारितः | तस्मान्नास्ति मनो राम चासत्कायसय कारणम् ॥ ६८ ॥
Then, making the supreme state the object of meditation, destroys ignorance, the root of transmigration, no doubt about it.
Verse 69
स्वप्ने दशिः क्रिया काय. कारणं मन उच्यते । यथा तथा सवंदापि मनो नास्ति क्रियाकरम् ॥ ६९ ॥
In mature meditation, in non-dual samadhi, called the supreme state, having attained, then recalling, becomes recognizing.
Verse 70
जिस प्रकार दपेणके बिना कोई भी पग्रतिबिम्ब नहीं भासता और इश्तीसे जस दपंणसं भिन्न प्रतिबिम्ब हे ही नहीं, इसी प्रकार चेतनके बिना और चतनसे भिन्न कुछ भी नहीं है। अतः मन भी चतनस भिन्न बिलकुत्ञ नहीं है ॥ ६४-६५ ॥ जेसे स्वप्नमें [ स्वाप्न पदार्थों सेडभिन्न ] सन नहीं*हे उसी प्रकार जाग्रतूमें भी मनकी प्रथक् सत्ता नहीं है। स्वप्नके समान जागम्रतमें भी कायनिवोहके लिये करणरूपसे मन की कल्पना हो जाती है॥६६॥ जिस प्रकार स्वप्नमें पेड़ काटनेके लिये स्वप्नकी ही कुल्हाड़ी होती हे [ वैसे ही मन भी कल्पित ही होता हैं]। परशुराम ! यदि स्वप्नकी क्रिया असत्य हूँ तो उछका साधन ही कंसे सत्य हो सकता है ॥ ६७ | मनुष्यके सींग होता ही नहीं। फिर उस अलीक नरश्ंगसे के कब बविदीण हो सकता हू। अतः परशुराम ! स्वप्नमें असत्य कायका कारण मन है ही नहीं ॥ ६८ !| स्वप्नमें जेसे दृक््शक्ति ही क्रियारूप काय और उसका कारण मन कहीं जाती है उसी प्रकार सबंदा ही जाग्रत् कालमें भी क्रिया 0५८ ले तल करनेबाला मन वास्तयमें नहीं ह | ६६ ॥ अष्टादशो5षध्यायः । २७१ चिदात्मा केवलः स्वच्छः स्वाच्छन्धान्मन आदिकम् । परिकतप्य. व्यवहरेत्. द्च्यद्रष्टादिभिदतः ॥ ७० ॥
He, the non-dual self, thinking "I am," directly destroys the root of transmigration, ignorance, with parts, quickly.
Verse 71
कचित् कचित् केवल तु निर्विकत्पात्मना स्थितः । श्रणु भागेंव चित्तत््वं परिपू्णणपि स्वयम ॥ ७१ ॥
The maturity of meditation is indeed the renunciation of thoughts; thought is various perceptions, but in one way, non-dual.
Verse 72
नाकाशतुल्य॑ चेतन्यात् स्वप्रकाशमतः स्थितम् । आकाशश्व चिदात्मा च न विलक्षणतां गतो ॥ ७२॥
By not even mentioning others, thought is renounced; when thought is renounced, thereafter non-dual is naturally established.
Verse 73
पृ्णः सक्ष्मो निरमेलथ्राजो5नन्तोडपि निराकृतिः । सवाधारो5्प्यसद्भात्मा सवान्तरबहिभवः ॥ ७३ ॥
As in the painting, when cleansed, the pure wall remains, indeed the making of the pure wall is cleaning the painting, indeed.
Verse 74
विशेषस्तत्र चेतन्यमाकाशे तन्न विद्यते । वस्तुतश्रैतन्यपूण. आत्मेवाकाश उच्यते ॥ ७४ ॥
Thus, by the removal of thought, the mind is naturally non-dual; non-dual self-attainment is indeed the renunciation of thought.
Verse 75
नद्यात्माकाशयोमेंदों लेशतोषप हि विद्यते । य आकाश: स आत्मव यथात्माडड्काश एवं सः ॥ ७५ ॥
There is no higher state to be attained than this pure state; even wise ones are deluded here by the power of illusion.
Verse 76
अज्ञाः पव्यन्त्यात्मरूपमाकाशमिति वे अ्रमात् । कपल शुद्ध चिदात्मा ही अपने स्वातन्श्यसे मन आदिकी कल्पना करके कभी तो द्रष्टा ओर दृश्य आदि भेदरूपसे व्यवहार करता हे ओर कभी केवल निर्विकल्प रूपसे स्थित रहता है || ७०-७१ पू० ॥| भ्गुनन्दन ! सुनो, चित्तत्त्व स्थयं परिपूण होनेके कारण आकाश के समान नहीं है | इसीसे बह स्वयंप्रकाश भी है। [ आकाशकी तरह जड़ नहीं हे । | इसके सित्रा आकाश ओर चिदात्मामें कोई ओर भेद नहीं है || ७१ 3०-७२ || आकाशकी तरह चिदात्मा भी परिपूर्ण, सूक्ष्म, निर्मेल, अजन्मा, अनन्त, निराकार, सबका आधार, असड्ग़ और सबके भीतर-बाहर रहनवाला हे | “उसमें विशेपता कंचल चतन्यकी ही है, आकाशमें यह गुण नहीं है। बास्तवम ता चतनन््यसे पूण आकाश ही “आत्मा” कहा जाता हैं ॥ ७३-७४ ॥ आकाश ओर आत्माका आर कोई लेशमात्र भी अन्तर नहीं है। जा आकाश हे बी आत्मा है ओर जा आत्मा है वही आकाश | [| ५७५ ॥ अज्ञानी लाग श्रमबश आत्माके स्वरूपको ही आकाशरूपमें देखते हें; र७र त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सोरालोक॑ यथोलरूकस्तमोमात्र॑ ग्रपध्यति ॥ ७६ ॥
The wise perceive this state in a moment, indeed; O sage, there are three types of qualified ones: highest, lowest, and middle.
Verse 77
आकाशमेव विज्ञास्तु पश्यन्त्यात्मचिदात्मकम् । परा चितिः परेशानी स्वच्छस्वातन्त्रयबरेभवात् ॥ ७७ ॥
The highest understand that state at the first instruction; contemplation and meditation also happen at the same time as hearing.
Verse 78
अवभासयदात्मानं परिच्छिन्नमनेकधा । यथा राम स्वमात्मानं स्वप्ने बहुविध प्रथक् ॥ ७८ ॥
For the highest, indeed, there is no effort in attaining that state; once, in the summer night adorned with moonlight.
Verse 79
मनुष्यादिविभेदेन भासयत्येबमेव हि । अनेकधावभासोडपि परिच्छिन्नद्शेव हि ॥ ७९ ॥
Embraced by the beloved, seated in a blooming garden on a luxurious bed, intoxicated by wine.
Verse 80
स्वयं स्वच्ष्ट्या पूर्णोत्मरूपिण्येव परा चितिः। ऐन्द्रजालिक एको5पि स्वमात्मानमनेकथा ॥ ८० ॥
I heard in the sky the sweet words of a group of siddhas, referring to the principle of non-duality, and realized that state at that time.
Verse 81
Realized through contemplation and meditation at that very moment; thus, in half a moment, having realized that pure state.
Verse 82
भासयंस्तत्र द्रष्टरणां स्वृरष्ट्या भासयेत् स्वयम् । एक एव निर्विकार एवं सा परमा चितिः॥ ८ १॥ शुद्धकरूपभासापि परिच्छिन्ना. छनेकघा । परिच्छिन्नस्वरूपाणां भासयेन्मायया बता ॥ ८२॥
For a moment, I became more with a concentrated mind, completely immersed in the ocean of supreme bliss.
Verse 83
जैसे उल्लू सू्यके प्रकाशको ही अन्धकाररूपमें देखा करते हैं ॥ ७६ ॥ ज्ञानी पुरुष तो आकाशको ही चेतन आत्माके रूपमें देखते हैं। भगवती पराचिति अपने निर्दोष स्वातन्त्यके बलसे अपने स्वरूपको ही अनेक प्रकारसे परिच्छिन्न रूपोंमें प्रकट करती है, जिस प्रकार कि परशुरामजी ! स्वप्नावस्थामें वह मनुष्यादि अनेकों रूपोंमें स्वयं ही भासित हुआ करती द्वे ॥| ७७-७६ पू० ॥ उसका यह अनेकरूपसे आभासना भी परिच्छिन्न रृष्टिसे ही है । स्वयं अपनी दृष्टिमें तो बह पराचिति परिपूर्ण आत्मस्वरूपिणी ही हैं || ७६ उ०-८० पू० | जिस प्रकार ऐन्द्रजालिक ( जादूगर ) अकेला होनेपर भी अपनेको दशकोंके प्रति अनेकों रूपोंमे आभासित करनेपर भी अपनी दृष्टिसे तो स्वयं अकेला ही रहता हैँ | ८० उ०--८१ पू० ॥ इसी प्रकार बह पराचिति एक और निर्विकार ही है तथा अपनी हृष्टिमें ] शुद्ध एकरूपमें ही भाप्तती भी है, तथापि मायासे आदत होनेपर बह परिच्छिन्न होकर अनेकों परिच्छिन्न रूपोंको भासित करने लगती है ॥ ८१ उ०-८२ ॥ अष्टादशो<्ध्यायः | २७३ मायावरणमप्येतत् परिच्छिन्नदशों भवेत् । यथन्द्रजालिकों मायावृतथान्यदशों भवेत् ॥ ८३ ॥
Then, having attained memory, I became engrossed in contemplation; oh, this wonderful state is indeed filled with bliss and nectar.
Verse 84
मायापरचितो5्त्यन्त॑ स्वातन्त्रयमतिदु्ेटम । लोके5पि योगिनो5्न्ये च मान्त्रिका ऐन्द्रजालिका: ॥ ८४ ॥
Having attained this unprecedented state again, I enter it; not even a fraction of the happiness of Indra and others would be sufficient in that state.
Verse 85
आच्छादित स्वस्वातन्त्यं प्राप्प किखित सुयुक्तितः। दुधेट घटयन्त्येव ततो नेतद्विचित्रितम् ॥ ८५ ॥
The happiness of this state, even in a fraction, is not comparable up to Brahma; until today, indeed, I have wasted this time.
Verse 86
एवं परचितेः स्वच्छस्वातन्त््यात् स्वात्मनो वषु: । अनेकधा परिच्छित्न भासितं॑ भृगुनन्दन ॥ ८६ ॥
Without knowing one's own treasure adorned with wish-fulfilling gems, one wanders for alms, indeed, seeking flour in a fist.
Verse 87
परिच्छेदोडभिमानस्थ त्वेकदेशे सुविश्रमः । साथ्प्यपूर्णत्वविख्यातियौडविद्या . परिगीयते ॥ ८७ ॥
Alas, people, deluded by ignorance of their own self-bliss, attain external happiness, only a fraction, with great effort.
Verse 88
अन्न मुहान्ति बहवस्ताकिकाः पण्डिता अपि। स्वात्मानमनुदाहत्य. बहिदेश्टितया. स्थितेः ॥ ८८ उसका यह मायारूप आवरण भी परिच्छन्न दृष्टिबालोंके लिये हे है, जेसे ऐन्द्रजालिक दूसरोंकी दृष्टिमें ही मायासे आबृत होताः ॥ ८ई ॥ पराचितिका परमस्वातन्थ्य ही माया है | यह अत्यन्त दुघेट है। लोकमें भी योगी लोग तथा दूसरे मान्त्रिक आदि थोड़ा-सा संकुचिंत सामथ्य पाकर किसी युक्तिप्ते न होनेवालो बातें करके दिखा दी. देते हैं। अतः पराचितिके लिये यह फोई बिचित्र बात नहीं. है ।| ८४-८५ | परशुरामजी ! इस प्रकार पराचितिके निर्मेल स्वासन्त्यके कारण अपना ही स्वरूप अनेक प्रकारसे परिच्छिन्न होकर भासने लगा है ॥८६॥: अभिमानका किसी एक देशमें टिक जाना ही 'परिच्छेद' हे।. वही अपुणंत्वबुद्धि भी है, जिसे 'अविद्या? नामसे कहा जाता है |८७॥ अपने आत्माका अनुसन्धान न करने तथा बाह्य दृष्टिसे स्थित रहने के कारण इस विषयमें अनेकों तार्किक्ों और पण्डितोंको भी भ्रम हो जाता है ॥ ८८॥
Enough of this vain effort for external happiness; I would indeed always be devoted to the infinite bliss.
Verse 89
। ३, कर्थाव् भ्सस्भव बातोंको भी सम्भव फर देनेया का दबे २७8 त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे गुरूपदिष्ट यत् किखित् सद्वाप्यसदपीतरत । अनुदाहत्य. चात्मानं यावत्न हवलोकयेत् ॥ ८९ ॥
Enough of this external activity for me; like grinding flour and reproof, indeed.
Verse 90
तावन्न फलमाप्नोति परोक्षात्मतया श्रुतेः । अतो मयोक्त राम त्वं सम्पश्यात्मनि सद॒दशा ॥ ९० ॥
Those foods, those indeed, garlands, and beds, varied ornaments, and pleasures with women.
Verse 91
चितियां परमा देवी सबंसामान्यरूपिणी । सा प्रकाशभयी यस्माज्जडव्यावृत्तरुपिणी ॥ ९१ ॥
Mostly long stale, yet enjoyed again, following others, my disgust indeed does not arise.
Verse 92
अतः स्वात्मनि विश्रान्तिस्त्वहन्ता पररूपिणी । जडाशिदात्मविभ्रान्ताश्विदात्मनि विभासतः ॥ ९२ ॥
Thus deciding, as much as I turned inward again, then another auspicious contemplation approached me.
Verse 93
न स्वरूपे स्वतो भान्ति तस्मान्न स्वात्मविश्रमः | चितेस्तु केवर्ल स्वस्मिन्ननन्यापेक्षया सदा ॥ ९३ ॥
Oh, this delusion of mind, why has it approached me? Even being blissfully complete self, I am indeed always established.
Verse 94
भासमानत्वतः स्वस्मिन्_ विश्रान्तिरुपपद्यते । पूर्णाहन्ता परा सेयं या जडेषु न विद्यते ॥ ९४ ॥
What do I wish to do again? What is there to be obtained by me? What have I not obtained, where, when, or how is it attained?
Verse 95
गुरुदेवने सत् , अप्तत् अथवा किसी अन्यरूपसे जो कुछ बतलाया है उसे जबतक आत्मानुसंघान करते हुएं नहीं देखा जायगा तबतक केवल परोक्षरूपसे सुन लेनेसे ही मोक्ष रूप फलकी प्राप्ति नहीं होगी । इसलिये परशुराम ! मेंने जो कुछ कहा है उसे तुम अन्तमुंखी दृष्टिसे अच्छीतरह अनुभव करो ॥| ८६-६० ॥| सम्पूर्ण पदार्थके विशेष अंशोंको त्यागकर उनमें सामान्यरूपसे आसनेवाली परमा देवी जो चिति है वही प्रकाशस्वरूपा है क्योंकि उसके स्वरूपमें जडताका सबेथा निपेध है ।॥ ६१ ॥। अतः वह स्वस्वरूपमें विश्रान्तिस्वरूपा है तथा पराहन्तारूपिणी हे । जड पदाथ उस चित्स्वरूपामें ही विश्रान्त है, चिदात्माके आश्रयसे ही उनका भान होता हे।॥ ६२ | वे अपने स्थरूपमें स्वयं प्रकाशित नहीं होते, इसलिये उनकी अपनेमें ही विश्रान्ति (स्थिति ) नहीं है। केवल शुद्ध चितिकी ही अपनेमें विश्रान्ति होनी सम्भव है, क्योंकि बह किसी अन्यकी अपेक्षा न करके सबदा अपने स्वरूपमें ही प्रकाशमान है। यही श्रेष्ठ पूर्णाहन्ता है, जो कि जड पदाथंमिं नहीं हे ॥ ६३-६४ ॥। अष्टादशो5ष्यायः । २७४ व्यावृत्तिः स्पशहीनेयं परिच्छेदविवजनात । सबंमस्या यतः संस्थमाद्श नगर यथा ॥ ९५॥
How could the achievement of the unachieved be true? Oh, how could there be action in my form of infinite consciousness and bliss?
Verse 96
व्यावत्तियों परिच्छेदः कथं केन हि सम्भवेत् । एव पूर्णस्वरूपाया: पूर्ण यत्स्फुरणं स्थितम् ॥ ९६॥
The body, senses, and inner faculties are indeed like a dream; all these are indeed mine, of the indivisible one consciousness-self.
Verse 97
तदेव स्वात्मविश्रान्तिः पूर्णाहन्ता च कथ्यते । अखण्डकरस॑ झोतदेतावद्राम वे भवेत् ॥ ९७॥
What would happen if one inner faculty is restrained? Even if others are unrestrained, they are indeed my minds.
Verse 98
निरूपणे बहुविधमिव तत् प्रतिभासते । एतावदेव स्वातन्त्यं यतः शक्तिहिं तन््मयी ॥ ९८ ॥
Thus, if one mind is restrained, what would happen to me? Restrained and unrestrained minds completely shine in me.
Verse 99
प्रकाशस्तेजसो यद्वदोष्ण्यं चेव्रापथकस्थितम् । एन स्वातन्त्यविश्रान्तिसहितेकरसात्मिका ॥ ९९ ॥
In the restraint of all minds, there is no restraint for me; from the vast and extensive space, where is the restraint in me?
Verse 100
इयमेव हि मायाख्या शक्तिः परमदुघटा। आदशवद्यत्खरूपे.. चिदेकरसरूपिणी ॥ १०० ॥
Thus, how could absorption (samadhi) be in me, filled with complete consciousness-bliss, more complete than the sky?
Verse 101
। फिर इसकी व्यावृत्ति या परिच्छेद किसीके द्वारा केसे हो सकते हैं। इस प्रकार इस पूर्णस्वरूपाका जो पूर्णरूपसे स्फुरित होना है वही स्वात्मविश्रान्ति या पूणोहन्ता कही जाती है । परशुराम ! ऐसी यह चिति सचमुच अखण्ड एकरस ही हे ॥ ६६-६७ ॥ केबल निरूपण ( चची ) के समय ही वह अनेक रूप-सी भासने लगती है | यही उसका स्वातन्त्य है और वास्तवमें वो डसका वह परमस्वातन्त्र्यरूप सामध्य भो तद्गप ही है, [ उश्षसे भिन्न नहीं ] ॥ ६८ || जिस प्रकार अग्निमें प्रकाश और उष्णता उससे अभिन्न ही रहते हैं उसी प्रकार इन स्वातन्द्रय और विश्रान्तिके सहित वह एकरसरूपा ही है ॥ ६६ ॥ यही असम्भवको भी सम्भव कर देनेवाली. क्या नामकी शक्ति है, जो दर्पणषकी तरह अपने स्थरूपमें एकरस चित्स्षरूपिणी रहते हुए २७६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सत्यप्यनेकबचित्रयाभासनेन विभासते ॥। तथा भासनकालेडपि स्वरूपादनिवत्तेनम् ॥ १०१॥
How could there be any action for me, by which good and bad even exist, in the infinite body-self appearances due to my greatness?
Verse 102
परिच्छेदावभासों यः सो5्नात्माभास उच्यते । साथावद्या जडशाक्तः सा झशन््य ग्रदक्रातिरेचव च ॥ १०२॥
What is the use of the appearance or absence of action for me? There is not even the least to be done or not to be done by me.
Verse 103
अत्यन्ताभावः आकाशस्तमः प्रथमसगंकः । सव॑ तदेव संग्रोक्त परिच्छेदनमादिमम् ॥ १०३ ॥
Therefore, what would be in restraint for me, full of bliss, whether in absorption or not, of true complete nature?
Verse 104
ही अनेकों विचित्र आभासोंके रूपमें भासने लगती है। और इस प्रकार भासनेके समय भी अपने स्वरूपसे च्युत नहीं होती ॥१००-१०१॥ इसमें जो परिच्छेदोंकी प्रतीति होती हैं वही अनात्माभास कहीं जाती हैं। तथा वही अविद्या, जडशक्ति, शून्य और प्रकृति भी कहलाती है ॥ १०२ ॥ उसका वह प्रथम परिच्छेद ही अत्यन्ताभाव, आकाश, तप ओर प्रथम सगं कहा जाता हैं ॥ १०३ ॥ परशुराम ! इसकी जो पू्णोहन्तारूप विश्रान्ति है उसीमें एकदेशताकी अ्रान्ति होनेसे आकाशका भान होने लगता है ॥ १०४ ॥
In whichever action this body is established, let it remain there itself; thus, I am serene in every way, an abode of great bliss.
Verse 105
राम यः परिषूणोत्मा विश्रमो वें समास्थितः । तस्यपेकदेशताआरान्तिकृतमाकाशभासनम्् ॥ १०४ 0 अत आत्मप्रदेशो य आत्माभिमतिवर्जितः । आकाश: स हि सम्प्रोक्त:ः स हि संसारकारणम् ॥ १०५॥
Of unending radiance form, I am completely full and stainless; thus, this is my declared state of the highest.
Verse 106
एप एवं भवेद्धेदः. पशुरष्ट्येकगोचरः । रांम सक्ष्ममशा पद्य य आकाशस्वत्वयेक्ष्तते ॥ १०६ ॥
For the inferior, the fruit born of knowledge comes after many births; for the middle, it comes gradually through hearing and contemplation.
Verse 107
तत्रत्यजीवराशीनामात्मा. चेतन्यमेव सः। यथान्यदेहेष्वाकाशो भासते यः सदा तब ॥ १०७ ॥
Meditation becomes, then knowledge arises; absorption joined with the fruit of realization becomes rare.
Verse 108
What is the use of hundreds of absorptions without the fruit of realization? Therefore, devoid of realization, there is no fruit by those absorptions.
Verse 109
तदेव मन इत्युक्तमात्मम न हि चेतरत्। तत्रावरणसुख्यत्वात् प्रमाणं॑ मन॒ उच्यते ॥ १०९ ॥
Even going in the world, in the paths illuminated by non-dual awareness, not knowing the objects, their ignorance does not end.
Verse 110
आवृतप्राधान्यतस्तु॒प्रमाता जीव उच्यते । एवमाकाशाबृताडपि चिदात्मा भूय एवं तु ॥ ११०॥
Realization known as non-dual, pure knowledge, own form, that always shines, indeed, even if not perceived.
Verse 111
आकाशे कोमलेःत्यन्तशिथिके निधेनेड्मले । कठिनरिलष्टघनतामालिन्यानां.. प्रकर्पनें! ॥ १११॥
By the covering of conceptions, indeed, in the removal of conceptions, the shining appears more, unprecedentedly.
Verse 112
भूतान्याभास्य देहात्मा देहेनापि समावृतः। कुम्मोदरगतो दीप उदरं व्याप्य भासते ॥ ११२॥
By the non-difference of knowledge and the known, the unknown is said to be known; thus, this becomes the highest order of self-realization.
Verse 113
एवमेप शरीरान्तरवभासनमात्रकः/ ै। आस्ते गूढप्रदीपात्मा तदन्तमोत्रभासनः ॥ ११३॥
O Brahmin, thus heard, contemplating again, you should know; then, knowing the self-principle, you will become accomplished.
Verse 114
जिस प्रकार दूसरोंके शरीरोंमें जो आकाश प्रतीत होता है बडी उनका चिदानन्दघनस्वरूप आत्मा है और वही सबंदा तुम्हारा भी आत्मा हे ॥ १०७ उ०-१०८ पू० ॥ इस प्रकार जो चेतन्यस्वरूप हमारे कल्पित आकाशसे व्याप्त है वही 'मन! कहा गया है और वही आत्मा भी है, कोई शून्य नहीं ॥ १०८ उ०-१०६ पू० ॥ आवरण करनेबवाली जडशक्तिकी प्रधानतासे उसे प्रमाणरूप मन कहते हैं और आबृत होनेवाली चित्शक्तिके प्राधान्यसे वही प्रमाता जीव कहा जाता है ॥| १०६ उ०-११० पू० ॥ इस प्रकार आकाशसे आवबृत हुआ भी चिदात्मा फिर पद्नभूतोंसे आवबृत हो जाता है। आकाश अत्यन्त कोमल, शिथिल, बिरल और निर्मेल है; किन्तु उसमें कठिनता, संश्लेष, सघनता और मलिनताकी कल्पनासे पद्चभूत प्रकट हो जाते हूँ। इस प्रकार देहसे आबृत होकर यह देहात्मा घड़ेके भीतर रखे हुए दीपककी तरह शरीरके भीतर व्याप्त होकर प्रकाशित होने लगता है॥ ११० उ०-११२॥ इस प्रकार यह आत्मा शरीरके भीतरी भागको ही प्रकाशित करता हे, जेसे घड़ेके भीतर रखा हुआ दीपक उसके भीतरी भागकों प्रकाशित किया करता है ॥ ११३॥ श्७८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे दीपग्रभा घटच्छिद्राथथा नियोति वे बहिः । एवमक्षद्वारसुखाद भूयों नियोति वें चितिः ॥ ११४ ॥
Thus instructed by Janaka, the great sage Aṣṭāvakra, honored and permitted, respectfully returned to his own place.
Verse 115
नियोणं तु चितेनोस्ति पूर्णत्वादक्रियत्वतः । स्वात्मावरणमाकाशं स्फूत्तिशक्तिश्रिदात्मनः ॥ ११५ ॥
Through contemplation and meditation, realizing the supreme state, removing all doubts, he quickly became liberated while living.
Verse 116
यावन्निवारयेत्तावन्नियाणं प्रधिभासते । मनोव्यापार एप स्यात स्फूत्त्योपहतिराबतेः ॥ ११६ ॥
Thus ends the seventeenth chapter named "Ashtavakra" in the revered Knowledge Section of Tripura Rahasya.
Key Takeaways & AI Summary
This chapter explores the profound teachings of The Utility of Wisdom for Liberation. It includes 116 verses detailing core themes like "", "", "".A sacred Shakta text revealing the supreme mystery of Tripura (the Divine Mother) — a dialogue between Dattatreya and Parashurama on consciousness, creation, and liberation.