Verse 1
द्वाविशोध्यायः श्रुत्वेवं राक्षसकथां रामो भृगुकुलोद्भवः । पुनः पग्रच्छावधूतकुलेश॑ प्रश्नयाश्रयः ॥ १॥
Having heard the story of the Rakshasa, Rama, the scion of Bhrigu's clan, with humility, asked the lord of the avadhutas again.
Verse 2
भगवन् कि तेन पृष्ट शापमुक्तदिजेन वें। हेमाड़देन कि प्रोक्तमेतन्मे कृपपा वद ॥ २॥
O Lord, what was asked by the curse-freed Brahmin, and what did Hemangada say? Kindly tell this to me.
Verse 3
कोतुक्यत्यन्तमत्राहं॑ न॒तदलपं भवेत् कचित् । इति पृष्टः पुनः ग्राह दत्तात्रयो दयापरः ॥ ३॥
I am greatly curious about this, and it is not a small matter. Thus asked again, compassionate Dattatreya said.
Verse 4
द्वाविशो5५ध्यायः ।। २२ ॥ वसुमानका समाधान, अन्थका सारांश इस प्रकार राक्षसकी कथा सुनकर श्रुगुकुलमें अबतीणे श्रीपरशुरामजीने विनयावनत हो अवधूतशिरोमणि श्रीदत्तात्रेयजीसे पुनः पूछा ॥ १ | “अ्गबन् ! शापसे मुक्त हुए उस त्राह्मणने क्या पूछा था और ट्टेमाक्नदने उसका क्या उत्तर दिया, कृपापूबंक यह मुकसे कहिये ॥ २ ॥ इस बिषयमें मुझे बड़ा कोतूहल दे, बह कोई छोटी बात कभी नहीं हो सकती। ऐसा श्रश्न होनेपर श्रीदत्तात्रेयजीनी दयालु होकर पुनः कददना आरम्भ किया--। ३े || ५ “परशुराम ! वह सम्भाषण बड़े गम्भीर अर्थसे भरा हुआ है, में तुम्हें सुनाता हूँ। तथ बसुमानने समीप ही बेंठे हुए देमान्नदसे पूछा-- ॥ ४ ॥
O Rama, I will tell you that which was spoken with great meaning. Then Vasuman asked Hemangada, who was present.
Verse 5
राजपुत्र किश्विदह॑ पृच्छामि त्व॑ समीरय । अहमष्टकयोगीशात्तदज्ञासिषमादितः ॥५॥
O prince, I ask you something, you answer. I learned that at first from the yogi Ashtaka.
Verse 6
शलि “शाजपुत्र ! में आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ, आप वर्णन कर। आरम्भमें मेने योगिराज अष्टकसे यह तत्त्व जाना था ॥ ४ ॥ ३४० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे भूयस्त्वदुक्तया च सम्यग विदितं परम पदम् । किन्तु ते ज्ञाततचस्य कथं स्थितिरियं भवेत् ॥ ६ ॥
Again, by your words, the supreme state is completely known. But how is the state of the knower of truth?
Verse 7
कर्थ ज्ञातसुविज्ञेयो.. व्यवहारपरायणः । ध्वान्तप्रकाशयोयद्रत् स्थितिरेकत्र सम्भवेत ॥ ७ ॥
How can the state of the well-known, of the knower, be dedicated to actions, be like the state of darkness and light together?
Verse 8
एतन्मे राजतनय ब्रृहि सम्यग् यथास्थितम् । इत्याएष्टः प्राह हेमाड्भदस्तं॑ ब्राह्मणोत्तमम् ॥ ८ ॥
O prince, tell this to me correctly as it is. Thus asked, Hemangada said to him, the best of Brahmins.
Verse 9
राम तत्ते प्रवक्ष्यामि महाथ तत् ग्रमाषितम् । ततः पप्रच्छ वसुमान् हेमाड्भदसुपस्थितम् ॥ ९ ॥
O Brahmin, your delusion is even now not completely destroyed. By actions, how is knowledge, which is self-existent, obstructed?
Verse 10
ब्रह्मन् ते भ्रान्तिरधापि न सम्यक् ग्रविनाशिता । व्यवहारेण कि ज्ञानं बाध्यते स्वात्मसम्भवम् ॥ ९ ॥ व्यवहारवशाजज्ञानं बाध्यतो च ततः कथम। पुरुषाथस्य लाभः स्यात् स्वमज्ञाससमेन वें ॥ १० ॥
If knowledge is obstructed by actions, then how is the gain of human goals possible by sleep-like knowledge?
Verse 11
सर्वोष्पि व्यवहारोडय॑ ज्ञानमाश्रित्य सम्भवेत् । तज्ज्ञानं बाध्यते तेन कथ्थं तन्मे समीरय ॥ ११ ॥
All actions, even this, may rely on knowledge. How is that knowledge obstructed by that? Explain this to me.
Verse 12
नी सा अब आपके कथनसे मुझे पुनः उप्त परम पदका अच्छी तरह ज्ञान हो गया। किन्तु तत्त्वज्ञ होनेपर भी आपकी ऐसी स्थिति क्यों होनी चाहिये १॥ ६॥ जिसने ज्ञेय तक्त्को जान लिया है वह व्यवहारमें केसे लगा रह सकता है? यह तो ऐसी ही बात होगी जेसे अन्धकार और प्रकाशकी “स्थिति एक जगह हो जाय || ७॥ राजकुमार ! इसनें जो भी कारण. हो वह मुझे ज्योंका त्यों 'सममकाकर कहिये |” ऐसा पूछा जानेपर हेमाइ्दने उस विश्रश्नेष्ठसे 'कहा--॥ ८ ॥ “ब्रह्मनू ! आपका भ्रम अभी अच्छी तरह निवषृत्त नहीं हुआ हे। क्या अपने ही आत्मस्वरूपसे रहनेवाला ज्ञान व्यवहारसे बाधित हो जाता है ९॥ ६ ॥ यदि व्यवहारके कारण; ज्ञान बाधित हो जाय तब तो स्वप्नमें होनेवाले ज्ञानके समान हुआ। उससे मोक्षरूप पुरुषाथकी प्राप्ति हो सकेगी १॥ १० ॥ यह सारा व्यवहार तो ज्ञानके आश्रयसे ही द्ोता है। फिर डसींसे -बह बाधित केसे हो जायगा--यह मुझे बताओ ॥ ११॥ द्वाविशोष्ण्याय: । ३४१ ज्ञानं तदेव हि भवेद् यत्रेदं भासते जगत्। सड्डल्पाद व्यवहारों हि ज्ञाने स्व प्रकाशते ॥ १२ ॥
Knowledge is indeed where this world shines. By resolve, all actions indeed shine in knowledge.
Verse 13
असड्डल्पेन तद्पमनुलक्ष्य धिया सकत। कृता्थों बन्धनिम्ुक्तो भवतीति सुनिश्रयः ॥ १३ ॥
Without resolve, observing that form by intellect once, one becomes accomplished, free from bondage. Thus, it is well-determined.
Verse 14
तस्माद् बल्नन्न ते प्रइनः सम्मतोड्य॑ धुबुद्धिमिः पुनस्तं प्राह वसुमान् नृपत्नुं महाशयम् ॥ १४॥
Therefore, O Brahmin, your question is not approved by the wise. Again, Vasuman said to the prince, "O great one."
Verse 15
सत्यं राजकुमारतन्मयापीत्य॑ सुनिश्चितम् । स्वरूप॑ निर्विकल्प॑ हि. संवेदनमिहोच्यते ॥ १५॥
Truth, O prince, this is also well-determined by me. True nature is indeed awareness without thoughts, as it is said here.
Verse 16
सविकल्पत्वमापन्ने पुनश्रोन्ति! कुतो न हि। विकल्प एवं हि आरान्तियंथा रज़ों श्रुजड्मः ॥ १६ ॥
With thoughts, having attained, where is not delusion again? Indeed, thoughts are delusion, like a snake in the rope.
Verse 17
श्रृणु अल्नन् न जानासि भ्रमाश्रमविनिणयम् । गगने नीलिमा भाति गगन जानतामपि ॥ १७॥
Listen, O Brahmin, you do not know the distinction between delusion and non-delusion. The sky appears blue even to those who know.
Verse 18
व्यवहारं च कुबन्ति नील॑ नभ इति चित । जिधमें यह जगत् भास रहा है वही तो .. जिध्षमें यह जगत् मास रहा है वही तो ज्ञान है। केवल संकल्प द्वारा ज्ञानमें ही तो सारे व्यवहारका भास होता है ॥ १२॥ हाँ, यह बात बिलकुल निश्चित दे कि निःसंकल्प हो जानेसे बुद्धिके द्वारा एक बार उस आत्मस्वरूपको लख लेनेपर जीब बन्धनसे मुक्त होकर कतार हो जाता हे ॥ १३॥ | इसलिये अह्मन् ! आपका यह प्रश्न श्रेष्ठ बुद्धिवालोंको मान्य नहीं है।” तब वसुमावने उस उदारचित्त राजकुमारसे पुनः कहा--॥ १४ ॥| “राजकुमार ! यह बात ठीक है और मैंने भी ऐसा ही निश्चय किया है। वास्तवर्मे अपना निर्विकेल्प स्वरूप ही शुद्धचिति कहा गया है ॥ १५ ॥ ु किन्तु यदि वह विकल्पयुक्त हो जाय तो पुनः आ्रान्ति क्यों नहीं होगी ? क्योंकि जैसे रज्जुमें सर्पका श्रम होता है वेसे विकल्प ही तो आन्ति है” ॥ १६ ॥ [ मय ] “बह्मन् ! सुनो, आप तो भ्रम और श्रमहीनताका निर्णय करना भी नहीं जानते। जो लोग आकाशको जानते हैं उन्हें भी उसमें नीलिम्रा तो दिखायी देती ही है। और वे “आकाश नीला ३५२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तावतैव तु तज्ज्ञानं न आन्तिरभिधीयते ॥ १८॥
They sometimes act saying the sky is blue. But by that knowledge, it is not called delusion.
Verse 19
अतचज्ञे हि सा आआान्तिस्तचज्ञे सा प्रमेव हि । हतप्रामाण्यजीव॑ तलज्ज्ञानं. मतमहाहिवत् ॥ १९॥
To the ignorant, however, that is delusion; to the knower of truth, that is indeed true knowledge. That knowledge is like a dead great snake without authority or living.
Verse 20
दर्पणप्रतिबिम्बस्थ व्यवहारसमो भवेत् । अभिज्ञस्यानभिज्ञस्य चाप्यतो5स्ति भिदा तयोः ॥ २० ॥
The action of the reflection in the mirror may be the same for the knowledgeable and the ignorant. But therefore, there is a difference between them.
Verse 21
ज्ुस्य प्रमेव तज्ज्ञानमज्लस्य तु अ्रमात्मकम् । ज्ञानिनां ज्ञानमेव स्यात् सर्वोडपि व्यवहारकः ॥ २१ ॥
For the wise, that knowledge is indeed true knowledge; but for the ignorant, it is delusion. For the wise, knowledge is indeed worldly transactions in all aspects.
Verse 22
दपेणप्रतिबिम्बानां. व्यवहारेण. सम्मितः अभिज्ञानामतों भूयो न हि आन्तेः समुद्भव/ः ॥ २२॥
By seeing the worldly transactions, as mirror reflections, they are equal for the knowledgeable. Therefore, again, there is no arising of delusion.
Verse 23
केवलाज्ञानननितं. ज्ञानेनि. विनिवत्तते दोपेण जनित॑ कस्माहिलीयेज्ज्ञानमात्रतः ॥ २३ ॥
That born of ignorance is only removed by knowledge. Why does the fault-born ignorance dissolve by mere knowledge?
Verse 24
मा है! ऐसा बोलकर कभी व्यवहार भी करते ही हैं। किन्तु इतनेसे दी उनका वह ज्ञान श्रान्ति तो नहीं कहा जाता ॥ १७-१८ ॥ अज्ञानीमें तो आकाशकी नीलिमाका ज्ञान श्रान्ति ही है, किन्तु तत्त्वज्षमें तो वह प्रमा ही हैं। उनका वह ज्ञान प्रामाण्यरूप जीवनसे रहित होनेके कारण मरे हुए सर्पके समान किसी अनथंका कारण नहीं होता ॥ *६ | शञानियोंका व्यवहार दपणके प्रतिबिम्बकी हलचलके समान होता है । अतः ज्ञानी और अज्ञानी इन दोनोंके व्यवहारमें भेद तो हैं ही ॥ २० | बह व्यवहारसम्बन्धी ज्ञान ज्ञानीकी तो भ्रमा है और अज्ञानीकाः भ्रम है | ज्ञानियोंके लिये तो सारा व्यवहार भी ज्ञानस्वरूप ही हैं॥२१॥ उनके लिये वह दर्पणमें भासनेवाले प्रतिबिम्बोंके व्यवहारके समान होता है। इसलिये ज्ञानियोंकों पुनः श्रान्ति की उत्पत्ति नहीं ह्ो सकती ॥ २२ ॥ शानसे तो उसीकी निवृत्ति होती है जो केवल अज्ञानस उतन्न हुआ हो । किन्तु जिसकी उत्पत्ति किसी अन्य दोषके कारण हुई हो पद केबल ज्ञानसे केसे लीन हो सकता हे १ ॥ २३ ॥| वननागग. द्वािशो5ध्यायः । ३४५३ अत एवं तेमिरिकः पश्येज्जानन्नपि द्वयम्। जगदाभास एपस्तु.. कमेदोपसमुद्भधवः ॥ २४ ॥
Therefore, indeed, the one with defective sight sees duality even when knowing. This world appearance arises from the fault of action.
Verse 25
तस्मादाकमंविलयं व्यवहारों न लीयते । समाप्त कमणि ततः शिष्येदद्दयचिन्मयम् ॥ २५ ॥
Therefore, worldly transactions do not dissolve into non-action. When action is completed, non-dual consciousness remains.
Verse 26
तस्मान्नास्त्येव विज्ञानं कदापि आरान्तिसम्भवः इति श्रत्वा पुनर्विप्रः पप्रच्छ नपनन्दनम् ॥ २६ ॥
Therefore, there is no occurrence of delusion for the wise. Thus, hearing this, the Brahmin again asked the prince.
Verse 27
अहो न॒पात्मज कथ॑ ज्ञानिनां कमे सम्भवेत् । ज्ञानाग्निसंस्पशनेडपि कमेतूलः कर्थ स्थितः ॥ २७ ॥
O prince, how may action arise for the wise? Even in contact with the fire of knowledge, how does action as cotton remain?
Verse 28
अथाह हेमाड्भदोडपि विप्र॑ त॑ नपनन्दन । ब्रह्मन् शण प्रवक्ष्यामि त्रिविध कम ज्ञानिनाम् ॥ २८ ॥
Then Hemangada, the prince, said to the Brahmin, "O Brahmin, listen, I will explain the threefold action of the wise."
Verse 29
सवपाश्व समान स्यादपक्व॑ पक्षमेव च। हतोदित॑ चेति तत्र नश्येज्ज्ञानादमध्यमम् ॥ २९ ॥
For all, the actions may be unripe and ripe. Destroyed and arisen, thus there, all are destroyed by knowledge, which is superior.
Verse 30
कमंणा पाचकः कालो नियत्या नियतः स्थित) । यही कारण हे कि तिसिर रोगवाला व्यक्ति यह जानते हुए भी कि पदाथ एक है डसे दो रूपमें देखता हे | यह जगतृकी प्रतीति तो प्रांरब्ध कसरूप दोषसे उत्पन्न हुई है। इसलिये जबतक प्रारब्धध्षय नहीं होता तबतक व्यवहारका भी लय नहीं होता | प्रारव्धकर्म समाप्त होनेपर तो केवल अद्वय चिन्मात्र तक्त्व ही रह जाता है ॥ २४७-२५॥ इसलिये विज्ञानमें ध्रान्वरिक्नी उत्पत्ति कभी नहीं हो सकती ।” ऐसा सुनकर उस त्राह्मणने राजकुमारसे पुनः पूछा--॥ २६ ॥ “हू राजकुमार ! ज्ञानीके द्वारा भला कम कसे हो सकता हैं? ज्ञानाग्निका स्पश हो जानेपर भी कमरूपी कपास केसे रह सकती ११ ॥ २७ ॥ तब राजकुमार हेमाड्भदने भी उस त्राह्मणसे कहा, “ब्रह्मन् ! सुनो, में बतलाता हूं। सभी ज्ञानियोंके कर्म समानरूपसे तीन भ्रकारके होते हें-अपक, पक्कत ओर हतोदित। इनमेंसे मध्यम ( पक्त ) को छोड़कर शेष दो नष्ट हो जाते हैं " २८-२६ ॥ नियति ( विधाता ) ने कालको कर्माका परिपाक करनेवाला नियुक्त ५४ त्रिपुरारहस्ये ज्लानस्वण्डे कालेन पाचितग्रायं॑ पकव कम समीरितम् ॥ ३० ॥
The cook of actions is time, which is determined and fixed. By time, those that are mostly cooked are mentioned as ripened action.
Verse 31
अपाचितमपक्त॑ स्थाज्ज्ञानोत्पत्तेरनन्तरम् । कृत हतोदित विद्धि ज्ञानाद्धतसमुद्धवात ॥ ३१ ॥
Uncooked, unripe action may be after the arising of knowledge. Know that these are done, destroyed, by arising of knowledge, arisen from the destruction (of ignorance).
Verse 32
तत्र पकत्रं तु यत॒ कर्म तदारव्धमितीयते। आवेगं॑ मुक्तशरतत्तिषवयेव फलप्रदम् ॥ ३२॥
There, indeed, the ripe action that is commenced, thus it is said, stands with force like a released arrow, bearing fruit.
Verse 33
तन्मूलको जगद्धासो ज्ञानस्यः तारतम्यतः । स्थितो5पि भ्रान्तितुल्योपि न भ्रान्तिः फलभेदतः ॥ ३३ ॥
Rooted in that, the world appearance by precedence of knowledge, is established, even like delusion, but not delusion due to a difference in result.
Verse 34
जनयेत्तत्कालफल॑ मन्दज्ञानवतां. स्फुटम । मध्यांनामस्फुर्ट तच्च॒ ज्ञानिनां फलभासनम् ॥ ३४ ॥
It generates immediate fruit, clear to those with intoxicated knowledge, and unclear to the middling. That fruit appearance is clear for the wise.
Verse 35
उत्तमानान्तु, तत्कालफलअ॒ स्पष्टभासनम् । शशशुद्गसमं ब्रह्ननू न हि. तत्फलमुच्यते ॥ ३५॥
For the highest, indeed, the immediate fruit has a clear appearance. O Brahmin, that fruit is not said to be, like the horn of a hare.
Verse 36
अज्ञानिनां करमफल पृष्ट पूर्णातुसन्धितः । किया है! जो कम कालके द्वारा प्रायः परिपक्व ( फलोन्मुख ) कर दिये जाते हूँ वे 'पक्व” कम कहे गये हैं ॥ ३० ॥ जो परिपक्व नहीं हुए हैं वे “अपक्व” हैं और .जो ज्ञानोत्पत्तिके पीछे किये जाते हैं उन्हें 'हतोदित” समझो, क्योंकि वे ज्ञानसे हत हुए ही उत्पन्न होते हूं ॥ ३१॥ इनमें जो पक्ब कम हैं वे प्रारब्ध कहलाते हैं। वे छोड़े हुए बाणके समान अपना वेग रहनेतक फल प्रदान करते ही हैं ।। ३२ ॥ ज्ञानकी न्यूनाधिकताके अनुसार उन्हींके कारण जगत्की प्रतीति बनी रहती हे | वह् जगतठ्मतीति अ्रान्तिके समान होनेपर भी फलमें भेद रहनेके कारण श्रान्ति नहीं हैं ॥ ३३॥ मन्द ज्ञानियोंको. यह प्रारव्ध तत्काल स्पष्ट फल प्रदान करता है | और मध्यम ज्ञानियोंको बह फलका भास अस्पष्ट होता हे || ३४ ॥ उत्तम ज्ञानियोंको फलका भास तत्काल एबं स्पष्ट तो होता हे, किन्तु नहान् | उनकी रृष्टिमें बह शशख्शंगके समान असत् होनेके कारण फल कहा नहीं जाना ॥| ३४॥ अज्ञानियोंको तो कर्मफलका अनुसन्धान पहले हीसे बना रहता है, द्वाविशोदष्यायः । १४४ पूवोपरानुसन्धानात् पोषित॑ तत्फलन्तु तेः ॥ ३६ ॥
For the ignorant, the fruit of action is nourished based on the past. From past and future connection, that fruit is nourished by them.
Verse 37
ज्ञानिनां फलसन्धानं छिन्नमात्मानुसन्धितः । अतो न पृष्ट मन्दानामारब्धजनित फलम् ॥ ३७ ॥
For the wise, the connection with fruit is cut off, once connected to the self. Therefore, the fruit generated by action is not nourished for the intoxicated.
Verse 38
For the middling wise, that fruit is like the pain caused by a mosquito in light sleep, attaining subtlety.
Verse 39
मध्यानां ज्ञानिनां तच्च. फल मन्दसुपृप्तिषु । मशकादिकृतं दुःखमिव तत् सक्ष्मां गतम्॥ रे८ ॥ उत्तमज्ञानिनां तत्त फल पू्णमपि स्थितम्। दग्धरज्जुरिव भवेत् स्थितात्मज्ञानवेभवात् ॥ ३९ ॥
For the highest wise, that fruit, even if complete, is like a burnt rope, due to the glory of established self-knowledge.
Verse 40
यथा नाटकबृत्तेप नरो वेषान्तर गतः। हृष्यन् विषीदंश् भूयों नान््तविकृतिमाप्लुयात् ॥ ४० ॥
As in the course of a play, a man taking different costumes, rejoicing and lamenting again, does not attain internal change.
Verse 41
एवमेष. स्थितज्ञानी. सुपूणफलसड्भतः । न फलेः स्पृश्यते तस्मात्तत्फलं शशघ्ृद्भवत् ॥ ४१ ॥
Thus, this one stable in knowledge, full of results, is not touched by fruits. Therefore, those fruits are like the horn of a hare.
Verse 42
अज्ञानिभिस्तु छुद्धात्मा नोपलक्षित एवं हि। इसलिये बह पुष्ट होता है । पूबोपरका अनुसन्धान रहनेके कारण वे उस फलका पोपण करते रहते हैं ॥ ३६ ॥ ज्ञानियोंको आत्माका अनुसन्धान होता रहनेसे बीच-बीचमें उनका फलानुसन्धान दूटता रहता है। इसीसे मन्द ज्ञानियोंका प्रारब्धजनित फल पुष्ट नहीं होता )| ३७ ।॥। मध्यम ज्ञानियोंके लिये तो बह फल, हल्की सुषुप्तिमें मच्छुट आदिके काठनेसे होनेवाले दुःखके समान बहुत कम दुःख देता हे | ३े८॥ उत्तम ज्ञानियोंको वह कर्मफल पूर्णतया प्राप्त होनेपर भी स्थिर आत्मज्ञानके प्रभावसे जली हुई रस्सीके समान केवल प्रतीतिमात्र रहता है ॥ ३६ ॥ जिसप्रकार नाटकमें अभिनय करते समय पुरुष अन्य वेष धारण करके हथ और शोककी भूमिका करनेपर भी भीतरसे किसी प्रकारके विकारको प्राप्त नहीं होता, उसी प्रकार “यह निष्ठावान् ज्ञानी पूर्णतया फलका संग प्राप्त होनेपर भी उमसे स्प्रष्ट नहीं होता । इसलिये उसका बह फलभोग शशः्ंगके समान केबल कथनमात्र ही होता है ॥ ४०-४१ ॥ अज्ञानियोंको तो शुद्ध आत्माका पता ही नहीं होता, इसलिये वे तो ३५६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अतो देहात्मभूतास्ते द्श्यसत्तविमशेनाः ॥ ४२॥
But by the ignorant, the pure self is not perceived. Therefore, they consider the body as the self, discerning the visible as true.
Verse 43
मन्दज्ञानिभिरात्मा तु विदितः शुद्धचिन्मयः जगच्चासत्यतोी रृष्टं तथाप्यभ्यासमान्यतः ॥ ४३ ॥
By the intoxicated in knowledge, the self is known as pure consciousness. The world is seen as unreal, but even thus, due to weak practice...
Verse 44
प्राग्वासनाहतज्ञानास्ते देहात्मप्रभासनम् । जगतः सत्यताभास॑ मध्ये मच्ये समाययुः ॥ ४४ ॥
Taken from previous impressions, their knowledge, considering the body as self, in between, come to the appearance of the world's reality.
Verse 45
भूयो ज्ञानवासना या विधुन्वन्त्यसती च्शम्। वासनेव॑ सत्यमिथ्याज्ञानयोथ. परस्परम् ॥ ४५ ॥
Again, by the impression of knowledge, they shake off the unreal perception. Thus, mutually, the impressions of true and false knowledge...
Verse 46
मिलिता मन्दज्ञानिनामतो मध्ये फल स्फुटम्। समे5पि वासने चेंते न हि तुल्ये महीसुर ॥ ४६ ॥
Combined, of the intoxicated in knowledge, thus, in between, the fruit is clear. Even if the opposing impressions are equal, these are not equal, O best of sages.
Verse 47
सत्यज्ञाननासनया चाध्यते वासना परा। न च मिथ्या वासनया वाघ्यते सत्यवासना ॥ ४७ ॥
By the impression of true knowledge, the other impression is obstructed. And by the impression of false knowledge, the true impression is not obstructed.
Verse 48
मिथ्यावासनयाविष्टों विस्मृतः केवलां परः। ततो मिथ्यावासनां तु विनिश्रित्य भ्रमात्मिक्राम ॥ ४८ ॥
Occupied by the impression of false knowledge, one has forgotten the supreme only. Then deciding that false impression as of delusion...
Verse 49
देहको ही आत्मा समभते हैँ ओर ऋृश्यको भी सत्य ही मानते हैं ॥४२॥। मन्द ज्ञानियोंकी शुद्ध चिन्सय आत्माका ज्ञान होता है और उन्हें जगत् भी असत्य दिखायी देता है; तथापि अभ्यासकी कमीके कारण पूव वासनाओंसे उनका ज्ञान दब जाता है ओर देह ही आत्मभावसे भासने लगता हे तथा बीच-बीचमें उन्हें जगतकी सत्यताका भान भी हो जाता है ॥ ४३-४४ ॥ किन्तु उनके जो ज्ञानके संस्कार हैं वे पुन उनकी इस असत् दृष्टिका दूर कर देते हैँ। इस प्रकार उनके सत्य और मिथ्या ज्ञानके संस्कार परस्पर मिलकर बीच-बीचपमें स्पष्ट फलका भाग कराते हैं।| ४५-४६ पू० ॥ ब्रह्मन ! यद्यपि ये दोनों ही संस्कार समानरूपसे आते रहते हें, तथा इनका प्रभाव एक-जेसा नहीं होता। ज्ञानकी वासना सत्यरूप है, इसलिये उससे दरृश्यकी मिथ्या बासना बाधित हो जाती दे; किन्तु हृश्यकी मिथ्या वासनासे सत्यवासना बाधित नहीं होती ॥४६ 3०-४७॥ दिप्रच: | जब वह मिथ्यावासनाके अधीन द्ोकर शुद्ध वासनाका भूल जाता है तो उस मिथ्यावासनाको श्रमरूप निश्चय करके त्याग द्वार्विशोडथ्याय: | ३५७ विधूय. वासनां सत्यामुपेति ब्राह्मणोत्तम । ततो न बाधिता सत्यवासना भवति क़चित् ॥ ४९॥
Shaking off the false impression, one attains the true. Then the true impression is not obstructed ever, O best of Brahmins.
Verse 50
मध्यमस्य विस्मृतिनों न मिथ्या ज्ञाममेव च। कि ९ अविस्मृतस्येच्छयेवमिथ्याज्ञानं क्चिद्धवेत् ॥ ५० ॥
For the middling, forgetfulness is not there, nor false knowledge. For the non-forgetter, by desire, the false knowledge sometimes may arise.
Verse 51
सिद्धस्येपा स्थितिः प्रोक्ता साधकस्योच्यते शृणु । यथा यथा तत्परः स्यात्तथा5विस्मृतिरुच्छिता ॥ ५१ ॥
This state of the accomplished is said of the aspirant, it is said, listen: as much as one is focused on that, so non-forgetfulness is elevated.
Verse 52
पूर्णस्य विस्मृतिनांस्ति मिथ्याज्ञानं प्रयत्नतः । उत्तमस्य पुनत्रह्ननू समाधिव्यवहार॒यो: ॥ ५२॥
For the complete accomplished one, forgetfulness of that is not; false knowledge is removed by effort. For the highest, again, O Brahmin, either in samadhi and worldly transactions...
Verse 53
न भेदों लेशतोड्प्यस्ति यतो5विस्मरणं सदा। यः समाधिपरों मध्यस्तस्य या5विस्मृति; स्थिता ॥ ५३ ॥
There is not even a little difference where non-forgetfulness (of that state) is always. For the middling, who is focused on samadhi, his non-forgetfulness is established.
Verse 54
सेपा म्लाना भवेन्मिथ्याज्ञानभूमिषु भूसुर । यस्वृत्तमो5पि स्वाच्चन्यात्प्रारव्घवशतो5बि वा ॥ ५४ ॥
It may be slightly faded and may be situated in the ground of false knowledge, O best of sages. Even the highest, due to free will or by destiny...
Verse 55
Even focused on samadhi, his forgetfulness may arise if negligent indeed. Actually, listen, O best of sages, about the middling and the highest of the wise.
Verse 56
हि बे ब्ड् सर ब्प देता है और सत्य ज्ञानवासनाको प्राप्त कर छेता है। इसके पश्चात् उसकी वह सत्यवासना फिर कभी बाधित नहीं होती ॥ ४८-४६ || मध्यम ज्ञानीको सत्यवासनाकी विस्मृति नहीं होती ओर न मिथ्या ज्ञान ही होता है। वह सत्यवासनाका बिना भुलाये ही कभी-कभी स्वेच्छासे व्यवहारोपयोगी मिथ्या ज्ञानकों स्वीकार कर लेता है ॥ ४० ॥ किन्तु यद स्थिति सिद्ध मध्यम ज्ञानीकी कही गयी है। अब सांधककी बतलाता हूँ, सुनो। साधक जसे-जस आत्मानुसन्धानसें तः्पर रहता है वैसे-वेसे उसे स्वरूपकी स्मति बढ़ती जाती है । पूर्ण होनेपर तो स्व॒रूपकी विस्म्ृति होती 'ही नहीं ओर मिथ्या द्वेतका स्कुरण भी प्रयत्न करनेपर ही होता है॥ ४१-४२ पू० ॥ त्रह्मन् ! उत्तम ज्ञानीकी दृष्टिमिं तो समाधि और व्यवहारका रेंशमात्र भी भेद नहीं होता, क्योंकि उसे स्वरूपकी स्म्रति सदा ही बनी रहती है ॥| ४२ उ०-४३ पू० ॥ जो समाधिनिप्ठ मध्यम ज्ञानी होता है उसे जो स्वरूपकी अविस्मृति रहती हे, हे त्राह्मण ! वह तो मिथ्या अज्ञानकी स्थिति आनेपर कुछ मन्द पड़ जाती हैं। किन्तु जो उत्तम ज्ञानी है वह ३५८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे समाध्यतत्परो भूयात्तस्याम्लानेव चास्म्रतिः । वस्तुतः घृणु भूदेव मध्यमोत्तमज्ञानिनाम् ॥ ५५ !] कम नंवास्ति यत्किश्विद्यतस्ते पूणतां गताः संविदात्मातिरिक्त यत्न ते परयन्ति किश्वन ॥ ५६ ॥
There is indeed no action at all because they have attained completeness. Beyond the self of consciousness, they see nothing.
Verse 57
कर्म शेष॑ कथं शिष्येद्र॒ःः सब॑ चिदग्निना । भस्मीकृतमतस्तेषां न किखित् परिशिष्यते ॥ ५७ ॥
How can any residue of action remain, because all is turned to ashes by the fire of consciousness? Therefore, nothing remains of theirs.
Verse 58
ऐन्द्रजालिककर्मेव त्वितररेव. दृश्यते। भ्ृणु ब्रह्मन् रहस्य ते ग्रवक्ष्यामि समासतः ॥ ५८ ॥
Like a magic show, the actions are seen only by others. Listen, O Brahmin, I will briefly explain the secret to you.
Verse 59
The vision of the wise is said to be like that of Shiva. There is not even the slightest difference; this is the truth without a doubt.
Verse 60
तस्मान्न किश्वित् कमोपि ज्ञानिनामनुवत्तेते । हाँते श्रत्वा स वसुमान् हेमाद्भदानरूापतम् ॥ ६० ॥
Therefore, no action follows the wise. Thus, hearing this, Vasuman, as explained by Hemangada...
Verse 61
सवसन्देहनिमुेक्तो विज्ञानविशदाशयः । स्वेच्छास अथवा प्रारव्धाधीन होनेपर भी यदि समाधिमें तत्पर न रहे तो भी उसकी स्वरूपकी अविस्मृति मन्द नहीं पड़ती ॥ ५३ उ०-४#४ पू० ॥ विप्रवर ! सुनो, वास्तवमें तो मध्यम ओर उत्तम ज्ञानियोंके कुछ भी कम हैं ही नहीं, क्योंकि वे तो पृणछ्ताको प्राप्त हो जाते हैं । एक चिदात्माके सिवा वे ओर कोई बस्तु नहीं देखते | ४५ उ०-४६ ॥। उनके किसी प्रकारके अवशिष्ट कम केसे रह सकते हैं, क्योंकि वे सब तो चेतनरूप अग्निसे भस्म हो गये हं। अतः उनके कोई भी कम शेष नहीं रहते ॥| ४७ ॥ मायावीके खेलके समान उनके कम तो दूसरोंको ही दिखाई देते हें। तह्मन् ! सुनो, इसमें जो गढ़ रहस्य दे वह में संक्तेपमें कहता हू ॥ «८ |। जसी दृष्टि शिवजीकी हे वेसी ही ज्ञानियोंकी दृष्टि बतलायी जाती है। उनमें ल्लेशमात्र भी अन्तर नहीं हे-यह बात निःसन्देह सत्य ह। इसलिये वास्तवमें ज्ञानियोंका कुछ भी कम शेष नहीं रहता ॥ ५६-६० पू० ॥ इस भ्रकार देमाद्नदका तत्त्वनिरूपण सुनकर बसुमान् सब सन्देदों ह्ाविंशो उध्यायः । ११६ पूजितो राजपूत्राधेः संस्थानं प्रत्यूपद्चत ॥ ६१ ॥
Free from all doubts, with a clear mind of knowledge, honored by princes and others, he returned to his place.
Verse 62
प्राप्ता स्वनगरं॑ राजपुत्रातपि ततः परम । एवं श्रुत्वा पुना रामः पग्रच्छात्रिसुतं म्ुनिम् ॥ ६२ ॥
Having reached their city, the two princes also then lived further, thus hearing, Rama again asked the sage, Atri's son.
Verse 63
से मुक्त हो गया तथा उसका अन्तःफरण विश्ञानके प्रकाशसे उब्ज्बल गया । फिर राजपुत्रादिसे सम्मानित हो बह अपने स्थानको चक्षा गया ॥ ६० उ०-६२ || इसलेः पश्चात् वे दोनों राजकुमार भी अपनी राज़घानीमें चले आये | यह सब सुनकर परशुरामने पुनः मुनिषर दत्तात्रेयसे पूछा--॥ 8२ ॥ . “गुरुदेव ! आपके सुखारविन्दसे निःर्रव यद्द ,श्षानोंपदेश मैंने सुना | इससे मेरा सन्देह जाता रहा और मुझे उस परमपद॒का श्षान भी हो गया ॥ ६३ ॥
This knowledge indeed heard, O guru, emanating from your mouth, has destroyed my doubt and made known that great state.
Verse 64
The self, pervaded by consciousness, shines everywhere. Even so, all was said by you from the beginning.
Verse 65
श्रुतमेतद्धि विज्ञानं गुरो लन्मुखनिगेतम । विनष्टो मम सन््देद्दो विदितं- तन्महत् पदम्॥ 5३ ॥ सवोलुस्यूतसंवित्तिमात्रात्मा भाति _ स्वतः । तथापि भवता प्रोक्तमादितः सबंमेव तु ॥ ६४-॥ संक्षेणे पुनत्रेदि विज्ञान. सारवत्तरम् । यावद्धारयितव्यं॑ में गुरों सवोत्मना मया ॥ ६५ ॥
Briefly, again, tell the most essential knowledge, as long as it is to be retained by me, O guru, with all my heart.
Verse 66
इत्यापृष्ट स रामेण पुनः प्राद्यात्रिनन्दनः । शरण राम प्रवक्ष्यामि स्वसारतमं॑ पुनः ॥ ६६ ॥
Thus asked by Rama, again, Atri's son said, "Listen, O Rama, I will explain the most essential again."
Verse 67
या चितिः परमेशांनी पूर्णाहन्तामयी पंरा। सा स्वातन्त्रयाभिधामायाशक्तिमाहमत्म्यतश सदा ॥ ६७ ॥
Which consciousness, the supreme goddess, complete, filled with the sense of 'I', that supreme, always known as the māyā power, from her greatness...
Verse 68
गा सबमें ओतप्रोत्त चिन्मात्र आत्मा ही सब ओर भास रहा हू । तथापि गुरुदेव! आपने आरम्भसे अबतक जो कुछ कहा हे उसे एक बार संक्षेपसे, जो सबका सारभूत विज्ञान हो और जितना भुझे सभी प्रकार ध्यानमें रखना चाहिये, पुनः सुनाइये” ॥ ६४-६५ ॥ परशरामके इस प्रकार पूछनेपर अतिनन्दन श्रीद्तात्रेयजी पुनः कहने लगे, “परशुराम ! सुनो, अब जो सबका अत्यन्त सार हे बद्द तुम्हें फिर सुनाता हूँ ।। ६६॥ जो परम समथो और पूर्णाहन्तामयी परा चिति है बद्द अपनी स्थतन्त्रतारूपा मायाशक्तिकी महिमासे, जो असम्भवकों भी सम्भव ३६० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे जगदाभासयेन्नून दुघेटेकविधायिनः । प्रतिभिम्भवदादर्श तत्प्रकारं शूणु क्रमात ॥ ६८ ॥
The world indeed manifests from the unique creator. Like a reflection in a mirror, listen to that method in order.
Verse 69
या सा पराचितिः पूर्णो पूणोहंभावजृंहिता। स्वातन्त्रयवशतः स्वात्मरूपं॑ द्वेघावभासयत् ॥ ६९ ॥
That supreme consciousness, complete, expanded with the complete sense of 'I', by the power of freedom, shines in its own form in two ways.
Verse 70
तत्रेकांशेउप्यहंभावों पूू्ण आमासितो यदा। तदा. द्वितीयभागस्तदहंभावविनिगेतः ॥ ७० ॥
There, even in one part, when the sense of 'I' is manifested incompletely, then the second part is separated from that sense of 'I'.
Verse 71
वाह्ममव्यक्तम भवत्तद्दरृष्टय व भूगूदह । अपूर्णाहंभावयुत एप. प्रोक्तः सदाशिवः ॥ ७१ ॥
That view became the external unmanifest, indeed, O descendant of Bhrigu. But the one associated with incomplete sense of 'I', this is said to be Sadashiva.
Verse 72
He, seeing that unmanifest part as different even from himself, "I am this," thus always knowing by intent on contemplating with non-difference.
Verse 73
स तमव्यक्तभागन्तु पढ्यन् भिन्नमपि स्व्रृतः | अहमेतदित्यभेदादनुसन्धिपरः सदा ॥ ७२७ स् एवं भूयः स्वातन्त्यात् सिसृश्षत्रिविधं जगत् । अव्यक्तमात्मनो... देहमेतदेवाहमास्थित:ः ॥ ७३ ॥
He indeed, again, by freedom, desiring to create the various worlds, occupied the unmanifest body of the self as "I".
Verse 74
कर देनेबाली है, दर्पेणमें प्रतिबिम्बके समान अपने हीमें इस जगत्को आभासित कर देती है। उसके जगत्-प्रकाशनका प्रकार क्रमशः सुनो ॥ ६७-६८ | बह जो परिपुर्ण पराचिति है पुणे अहंभावके कारण अत्यन्त विस्तृत है। अपने स्वातन््यके अभावसे उध्तने अपने ही स्व॒रूपको दो रूपोंमें आभासित किया ॥ ६६ | जब उसके एक अंशमें अपूर्ण अहन्ता आभासित हुई तो दूसरा भाग उस अहन्तासे शून्य बाह्य ( जड ) अव्यक्त हो गया। भ्रगुनन्वन ! उस बाह्म अव्यक्तकी दृष्टिसे ही वद्द अपूर्ण अद्दन्तायुक्त अंश 'सदाशिव” कहा जाता हूं || ७7-०१ ॥ बह यथपि उम्र अव्यक्त अंशको अपनेसे भिन्न ही देखता हें तथापि उसे सबंदा अभेद्पूर्वक यही जान पढ़ता है कि यह में ही हूं | ७२॥ उसीको स्थतम्त्रवाफके कारण फिर अनेक प्रकारका जगत् रचनेकी इच्छा हो जाती है और बह अव्यक्तरूप अपनी देदमें 'में यद्दी हूँ? ऐसी आस्था फरने लगता है ॥ »३ ॥ द्वाविंशोध्यायः इत्येवमनुसन्धानपर. इधर आबभो । अव्यक्तमभिमानेनाविष्ट इश्वर एवं तु ॥७४॥
Thus, so intent on contemplating, the lord manifested. Occupied the unmanifest identification, indeed the lord.
Verse 75
त्रिधासमभवद्ग॒ द्रहरिद्ुहिणरूपतः | द्रष्ट्टश्यमहाराशिसमुदायावभासकः ॥ ७५ ॥
He became threefold, in the forms of Rudra, Hari, and Brahma, manifesting the vast aggregation of the seer and the seen.
Verse 76
विधयो विविधा आसंस्तथा तद्गूपसंस्थिताः । वहवो हरयोष्प्यासंस्तत्संहारपरायणाः ॥ ७६ ॥
Various forms became established in those forms. Many forms of Hari also became intent on destruction.
Verse 77
अनेकशो5भवन् रुद्रा एवमेष जगद्विधिः । एवंविधं जगत्तत्त॑ दपेणप्रतिविम्बबत् ॥ ७७॥
Numerous forms of Rudra thus became. This world order, thus, the world essence, is like the reflection in a mirror.
Verse 78
भासते केवल राम न हि जात॑ तु किश्वन । पराचितिः प्रपूर्णाहंभावरूपेव सदा ॥ ७८ ॥
It shines only, O Rama, not anything born/appears. The supreme consciousness, indeed always in the form of complete 'I'.
Verse 79
स्थिताप्यनेका. सम्पूर्णाहभावपरित्रंहिता । यथा त्व॑ राम स्वेस्मिन् देहे5हंभावबृंहितः ॥ ७९ ॥
Established, also numerous, enveloped in the complete sense of 'I'. As you, O Rama, filled with the sense of 'I' in all bodies.
Verse 80
पृथड नेत्रादयहंभावेरपि. तत्तत्क्रियापरः । ३६१ इस प्रकारका अनुसन्धान करने लगनेपर वह _ईखर! हो गया। जो अभिमान द्वारा अव्यक्तमें आविष्ट हे वही 'ईश्वर' है ॥ ७४ ॥ इस दृश्यब्ग के महान् राशिरूप समुदायका अबभासक वह द्रष्टा ही रुद्र, विष्णु और ब्रह्मा रूपसे तीन प्रकारका हो गया ॥ ७५ ॥ इस त्रह्माण्डकी स्थिति ( उत्पत्ति ) करनेवाले त्रह्मा अनेकों थे, विष्णु भी अनेक थे तथा इस ज़गतका संहार फरनेदाले रुद्र भी अनेकों थे। ऐसा ही इस जगत्का विधान है| ७६-७७ पू० ॥ दपणमें प्रतिविम्बके समान इस संसारका स्वरूप हे ऐसा ह्टी है। परशुराम ! यह केबल भासता ही है) वास्तबमें हैँ कुछ नहीं ॥ ७५७ उ०-७८ पू० ॥ हि परिपुर्णरूपा पराचिति सर्बंदा [अहंभावरूपा दी देँ। वह स्थिरस्वरूपा होनेपर भी सम्पूण अहंभाषोंसे विस्टटत हुइ-सी का पड़ती है, जिस प्रकार कि परशुराम ! तुम इस देहमें न व्याप्त हो, तथापि नेत्रादि विभिन्न अहंभावोंके द्वारा भी उन अनेफ व्यापारोंमें लगे रहते दो ॥| ७८ ड०-८० पू० ॥ ३६२ त्रिपुरारहस्ये शानखण्डे एवमेव परा संवित् पूर्णाहन्तासमाश्रया ॥ ८० ॥
Different eyes and other senses of 'I', also engaged in various actions. Thus indeed, the supreme consciousness rests in the complete 'I', everywhere.
Verse 81
सदाशिवादिस्तंबान्ताब्पूर्णाहन्ताश्रयापि. वे । वस्तुतः सेव परमा चितिरेवं हि भासिनी ॥ ८१॥
From Sadashiva onwards to a blade of grass, even resting in the incomplete sense of 'I', truly, she indeed is the supreme consciousness, shining thus.
Verse 82
देद्ाहंभांवंरुपस्त्व॑ स्वतो. रूपरसादिकम् ।ै ग्रहीतुमसमर्थोडपि चाक्षतादात्म्यमेत्य. तु ॥ ८२॥
The form of bodily 'I', you, by yourself, are incapable of grasping form, taste, etc., but it is by attaining identity with consciousness.
Verse 83
से ग्रहासि सततमेव देवः सदाशिवः । स्वतः स्वोभेदमयो ब्रक्मादिस्तम्बराशिषु ॥ ८३ ॥
You grasp everything always, thus, O lord Sadashiva, by yourself, full of non-difference with everything, from Brahma to a blade of grass.
Verse 84
अतस्तादात्म्यमापञ्नो जानाति च करोति च । यथा ते निर्विकल्पं तु रूप॑ सर्वाश्रयं हि सत् ॥ ८४ ॥
Attaining identity within, he knows and does. Just as your form, indeed, is without difference, the basis of all being.
Verse 85
न किश्विदपि जानाति करोति च भृगूदह । एवमेव परा संवित् सर्वेलोकसमाश्रया ॥ ८५॥
But also, does not know or do anything, O descendant of Bhrigu, thus indeed, the supreme consciousness is the basis of all worlds.
Verse 86
भेदलेशमपि क्वापि न जानाति करोति च। एतावज़ागत॑ स्व तस्यामेवावभासते ॥ ८६॥
Not knowing or doing even the slightest difference anywhere, thus, all the world shines in her indeed.
Verse 87
इसी प्रकार यह परा चिति भी पृण अहन्ताकी आश्रय हे, तथापि यह सदाशिवसे लेकर स्तम्बपरयेनत अपूर्ण अहंभाबोंकी भी आश्रय हैं। वास्तवमें तो बह पराचिति ही इस प्रकार (इन सब रुपोंमें ) भासनेवाली है | ८० उ०-८१ ॥ तुम देहमें अहंभावरूप होकर यद्यपि स्वयं रूप-रस आदि विषयोंको ग्रहण करनेमें असमथ हो, तथापि इन्द्रियोंसे तादात्म्य करके तो पषेदा सब कुछ ग्रहण करते ही हो । इसी प्रकार भगवान्. सदाशिव यद्यपि ब्रह्मासे लेकर स्ठम्ब पयन्त सबके साथ अभिन्नरूप ही हैं, तथापि उन ब्रक्मादिके शरीरॉमें तादात्म्य होनेपर वे ही सब कुछ जानते भी हैं ओर करते भी हूं | ८२--८४ पु० ॥ जिस प्रकार तुम्हारा निर्विकल्प स्वरूप सबका आश्रय और सत् है, किन्तु भृगुनन्दन ! वह न तो कुछ जानता हैं और न कुछ करता है; इसी प्रकार वह परा चिति यद्यपि सम्पूण लोकोंकी आश्रय ] ७ रे कि... है, तथापि वह लेशमात्र द्वेवकों भी नतो जानती है ओर न कुछ करती ही है ॥ ८४ उ०-८६ पू० ॥ यह सारा जगत्पपन्न उसीमें मास रहा है, किन्तु अपनी स्व॒तन्त्र6,च्ओओ--+ द्वाषिशोष्ध्यायः । ३६३ तत्स्वातन्त्यात्. प्रभूतथ्च॒दपेणप्रतिबिम्बवत् । जगतो भासनं सं तस्या एवावभासनम् ॥ ८७॥
By her freedom, manifested and like a mirror reflection, the shining of the world, all, indeed, is her reflection.
Verse 88
Like a mirror reflection, indeed, here you, I, and others, the seers, are indeed consisting of reflection.
Verse 89
यथादशॉभास एप प्रतिबिम्बावभासनम । अन्र त्वमहमन्ये च द्रष्टरो दृद़मया! खलु॥ <८ ॥ च्व्यासंमेलने झुद्धचितिरिव न चेतरत्। घटादिदपणो यदह्दद्. घटादीनामसड्भरमें ॥ ८९ ॥
In the meeting of the seen objects, pure consciousness is indeed, otherwise not affected. Like the non-connection of the mirror, with pots and others.
Verse 90
शुद्धदपेणमात्रः. स्याहिभेद! प्रतिबरिम्बतः । एवं... विकत्पसम्भूतद्य्याभासप्रमाजने ॥९०॥
Just as pure mirror, may be the mere distinction is of reflections. Thus, in erasing the appearance of the seen arising from imagination...
Verse 91
शेषिता परमा संविदद्वितीयस्वरूपिणी । महानन्ददना चेषा दुःखलेशविवजनाव ॥ ९१ ॥
Remaining as supreme consciousness with a non-dual nature, full of great bliss, and from the absence of the slightest sorrow.
Verse 92
सवोनन्दधनाकारा यतः . सर्वैरभीप्सिता । सुखमात्मस्परूप॑ स्यात्सर्वैयस्मादभीप्सितम् ॥ ९२ ॥
Because it is the form of all condensed bliss and is desired by all, happiness may be the self-nature, because it is desired by all.
Verse 93
विन जन >ण ंओ &30-७-रूपा शक्तिसे वही दपणमें प्रतिबिम्बंके समान अनेकरूप हो गयी हे। अतः यह जगत्का सारा अवभास वास्तत्रमें उसीका आभास है, जिस प्रकार कि प्रतिब्रिम्बकी प्रतीति केवल दपणका ही आभास होती है ।। ८६ उ०--८८ पू० ॥ यहाँ जो मैं तथा अन्य देखनेवाले हैं के निश्चय चिन्मात्र ही हैं। यदि उनके साथ रृश्यकी मिलावट न हो तो वे शुद्धचिति ही हैं, और कुछ नहीं | ८८ उ०-८६ पू० | जिस प्रकार घटादिके प्रतिबिम्बोंसे अवच्छिन्न दषण घटादिका संग भ रहनेपर शुद्ध दपणमात्र ही होता है। उसमें जो भेद है बह तो प्रतिबिम्बके कारण ही है || ८६ उ०-६० पू० ॥ इसी प्रकार विकल्पसे उत्पन्न दृश्यरूप आभासका मार्जन (निपेघ) करनपर बची हुई परा चिति तो अद्वयस्वरूपा ही है। बह दुःखके हाशस शुन्य है, इसाॉलय परमानन्द्घनस्वरूपा भी हें ॥ ६० ड८-६१ ॥ य्रद सम्पुण आंनन्दोंकी घनीभूत मूत्तिं है, क्योंकि उसे सभी चाहने हैं। स॒ुस्य आत्माका स्वरूप ही हे, क्यों सभीको उसकी सालाथा है ॥ ६९ ॥ ३६४ त्रिपुरारहस्ये ल्लानखण्डे यदर्थो देहादिभावो यत्न कस्याएँ नेप्सितम् । यस्येव लेशो विपयानन्द हइत्यमिश्रीयते ॥ ९३ ॥
For the sake of which bodily existence, which is not desired by anyone, a trace of whose existence is indeed called pleasure from objects.
Verse 94
That (supreme consciousness) indeed shines in the loss of burden and in deep sleep. Consciousness indeed is called bliss from desirability.
Verse 95
स॒ एवं भारहानादी सुपुप्तों चावभासते। चिदेव स्पृहणीयत्वादानन्द इति प्रोच्यते .। ९४ ॥ मूढा न हि विजानन्ति स्वात्मभूतं महासुखम्। विभिन्नममभिजानन्ति व्यज्ञकानां विभेदत) ॥ ९५॥
The deluded do not know the self-nature of great bliss. They perceive differences by the difference of expressions.
Verse 96
यथा हि दर्षणे भावा भासमाना निमित्ततः । यावदरपणविज्ञानं भिन्ना एवं विभान्ति बें ॥९६॥
As indeed, objects appearing in the mirror, their cause, as long as the knowledge of the mirror is there, it indeed shines as different.
Verse 97
विदिते ग्रतिविम्बत्वे भासमानं च पूर्ववत् । न दपणाद् भिन्नमस्ति त्वादशः शुद्ध एवं हि ॥ ९७ ॥
When known as reflection, though appearing as before, is not considered different from the mirror, the mirror is indeed pure.
Verse 98
एवं विदिततर्वस्थ. जगदेतावदीदशम् ।ै भासमानमपि स्वात्ममात्रमव न चेतरत् ॥ ९८॥
Thus, to the one who knows the truth, the world appears like this, everything is only the self, indeed, not otherwise.
Verse 99
घटादिक मृदि यथा हेम्लनि यद्ृद्विभूषणम् । जिसके लिये देहादिमें प्रीति होती है, जो किसीको भी अप्रिय नहीं हे और ज्ञिसका लेशमात्र अंश ही “विषयानन्द'ः कहा जाता है, वह स्वरूपभत आनन्द ही भार आदिकी निमत्ति होनेपर तथा स॒षुप्ति अवस्थामें भासता है। वास्तबमें तो वाबछनीय होनेके कारण चेतन ही आनन्द! कहा जाता है ॥ ६३-६४ ॥ अज्ञानी पुरुष अपने आत्मासे ही प्राप्त होनेबाले उस परम सुखकों नहीं जानते; वे तो उसको व्यक्त करनेवाले विषयोंकी विभिन्नताके कारण अपनेसे भिन्न ही समभते हैं ॥ ६५ ॥ जिस प्रकार बिम्बरूप निमित्तोंके कारण दर्पणमें भासनेबाले पदार्थ, ज़बतक दर्पणका ज्ञान नहीं होता उससे भिन्न ही जान पड़ते हूँ, किन्तु जब उनकी प्रतिबिम्बताका ज्ञान हो जाता हे तो पहले हीकी तरह भासते रहनेपर भी वे दपणसे भिन्न नहीं रहते | और दर्पण तो शुद्ध है ही। उसी प्रकार जिसे तत्त्वज्ञान हो गया है उसके लिये यह जगत् इसी रूप भासता रहनेपर भी अपना आत्मा ही है, ओर कुछ नहीं ॥ ६६-६८ ॥ जैसे मृत्तिकामें घटादि, सुत्रणमें आभूषण और शिलामें प्रति द्वार्विशोष्ण्याय: | ३६५४ शले जगदेव॑ प्रतिमाथ यथा शेले जगदेव॑ चिदात्मनि ॥ ९९॥
As pots and others in clay, just as ornaments in gold, and images in stone, thus the world is in the self of consciousness.
Verse 100
जगन्नास्त्ययेति. दृष्टिरपूणेव. भृगृद्रह । ८ कप नास्तीति विपरीतो हि निश्रयो नेव सिद्धयति ॥ १०० ॥
The vision that the world does not exist indeed is incomplete, O descendant of Bhrigu. The determination, indeed, the opposite of it does not exist, does not accomplish too.
Verse 101
साधकात्मजगद्दृष्टे भू! सम्भवतः स्फूटम् । नास्तीति शापमात्रेण कर्थं स्याज्नगतों लयः ॥ १०१ ॥
From the perception of the aspirant, the world clearly arising again, how can the world be dissolved by mere curse, saying it does not exist?
Verse 102
७ (६ आदशनगरं सवमस्त्यादशेस्वभावतः । ० ८४ दात्मेक के एवं जगन्नदात्मकरेप सत्यम्रुदीरितम् ॥ १०२॥
All is like a city of reflections, existing by the nature of a mirror. Thus, the world is declared to be one form with the consciousness-self, the truth.
Verse 103
पूर्णविज्ञाममेतत् स्यात् सह्लोचपरिवजेनात । च्गेव द्व्यतां प्राप्त स्वमाहात्म्यप्रकपतः। ॥ १०३ ॥
This may be complete knowledge by eliminating contraction. This seer itself, attained seen (seeing seer-seen separately), by the greatness of its own glory.
Verse 104
रु यथादशों नगरतामेप शास्रार्थसंग्रहः । न वन्धोडस्ति न मोक्षो5स्ति साधकः साधनं च न ॥ १०४ ॥
As the mirror has the reflection of a city, this is the essence of scripture. There is no bondage, no liberation, no aspirant, and no means.
Verse 105
भाओंकी प्रतीति होती है उसी प्रकार चिदात्मामें यह जगत् भास रहा है ॥ ६६ ॥ _ परशुराम ! जगत है ही नहीं? यह दृष्टि तो अपूर्ण ही है, क्योंकि है ही नहीं! ऐसा विपरीत निश्चय किसी प्रमाणसे सिद्ध नहीं होता ॥ १०० ॥ [ सम्पूर्ण द्वेतका निपेघध कर देनेपर “हैः ओर “नहीं है! इन दोनों ही पक्षोंको ] सिद्ध करनेवाले चिदात्मस्वरूपसे फिर भी जगत्की सत्ता स्पष्टठया रह ही जाती है। ऐसी अवस्थामें 'संसार है हीं नहीं” ऐसा शाप देनेसे ही भला जगत्का लय केसे हो सकता है ? ॥ १०१ ॥ जिस प्रकार दर्पणमें प्रतीत होनेवाला नगर दर्पणरूपसे तो हैं ही, उसी प्रकार जगत् अद्वितीय चिदात्मस्वरूपसे तो सत्य ही कहा गया है || १०२॥ यही पूर्ण विज्ञान हैं, क्योंकि इसमें किसी श्रकारका सह्लोच ( कमी ) नहीं है। वास्तवमें अपने स्वातन्त्रयके प्रभावसे रक् ( शुद्ध चेतन ) ही दृश्यरूप हो गया हैं; जेसे कि दर्पण ही अपनेमें प्रतिबिम्बित नगररूप हो जाता हे-यही संक्षेपमें शाखत्रोका तात्पय है ॥ १०३-१०४ पू० ॥। हि झौ न बन्ध है, न मोक्ष है, न साधक है और न साधन है। एक ३६६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अखण्डाइयचिच्छक्ति खिपुरेवावमासिनी | सेवातिद्या च विद्या च बन्धो मोक्ष साधनम् ॥ १०५ ॥
The unbroken non-dual consciousness power, Tripura, indeed, shining, she indeed is ignorance and knowledge, bondage and liberation, and the means.
Verse 106
एतावदेव विज्ञेयं नान्यद्भागंव विद्यते । एतत्तेडमिहित॑ राम विज्ञानक्रममादितः ॥ १०६॥
This much indeed is to be known; nothing else exists, O descendant of Bhrigu. This has been told to you, O Rama, the process of knowledge from the beginning.
Verse 107
एतत् सुविज्ञाय जनो भूयः क्राषि न शोचति । नारदेष ज्ञानखण्डः सपपस्युपलव्धिक! ॥ १०७ ॥
Knowing this well, a person further does not grieve anywhere. O Narada, this piece of knowledge is obtained by proper reasoning.
Verse 108
श्रुतो न नाशयेत् कस्प मोहमज्ञानसम्भवम् । श्रुत्वाप्येतद्यस्य मोहो न शान्ति प्राप्लुयात् कचिव् ॥ १०८ ॥
Heard, if it does not destroy whose delusion arising from ignorance. Even after hearing this, whose delusion exists, he may not attain peace anywhere.
Verse 109
स॒शैलपुरुषो लोके केन ज्ञानं पुनर्भवेत् । सकृदेव श्रुत॑ बेतद्िज्ञानं जनयेदू द्ठम् ॥ १०९ ॥
That mountain-like man in the world, by this knowledge, how can he be born again? Once heard indeed, this knowledge may become firm.
Verse 110
In two or three ways, for the dull, knowledge may not be generated. This destroyer of the flood of sins, heard, is considered the giver of knowledge.
Verse 111
द्विधा त्रिधा वा मन्दस्य ज्ञानं न जनयेत् कथम् । हल आम अख़ण्ड अद्वयस्वरूपा चित्-शक्ति ही प्रकाशित हो रही हे | बही अविद्या और विद्या है तथा बही बन्ध, मोक्ष और साधन भी हैं || १०४ उ--१५०४ ॥ + श्मुनन्दन * बस, इतनी बात ही जानने योग्य हे, और कुछ नहां। परशुरान ! इस प्रकार आरम्भसे ही यह मैंने तुम्हें ज्ञानप्राप्तिका कम झुना दिया। इसे अच्छी तरहसे समझ लेनेपर पुरुषकों फिर किसी भ्रकारका शोक नहीं होता ॥ १०६--१०७ पू० ॥ [ श्रीहारितायन मुनि कहते हें-- ] नारद ! यह ज्ञानखण्ड सम्यक् अकारस युक्ति ओर अनुभवसे पूर्ण है। यदि इसका श्रवण किया जाय तो ऐसा कौन है जिसके अज्ञानजनित मोहको यह दूर न कर कि ०७ उ०-१५८ पू० ॥ ह द्स सुनकर हे जिसका मोह शान्त न हो वह ता इस लोकमें पत्थरकी मूत्ति ही हे उसे फिर और किसके द्वारा ज्ञान होगा १॥ १०८ उ०--१०६ पू० ॥ ४ तो एक बार श्रव॒ण करनेपर ही दृढ ज्ञान उत्पन्न कर देता हैं। फिर जो मन्दबुद्धि है उसे भी दो-तीन बार सुननेपर केसे ज्ञान उत्पन्न नहीं करेगा ?॥ १०६ उ८--११० पू० ॥ यह अ्रन्थ श्रवण करनूपर पापराशिको शान्त करनेबाला और तबिशुद्ध द्वाविशोष्ष्यायः | ३६७ लिखितं दृष्टिदोषप्न॑ पूजितं चित्तशोधनम् । मृढतानाशनं चेतत् सवंदा परिशीलितम् ॥ १११ ॥
Written words, these are destroyer of fault perception, revered, purifier of the mind, destroyer of delusion, this should always be practiced.
Verse 112
सवोत्मभूत॑ यद्ूप॑ विचायोवगत॑ स्फुटम् । मुक्तिः स्यादन्यथा बन्धः सा भवेत्त्रिपुरिव हीम ॥ ११२ ॥
Whose form is all-soul-prevading, clearly understood by consideration, liberation is attained. Otherwise, it may be bondage. She indeed is Tripura, hrim.
Verse 113
Thus ends the twenty-second chapter named "The Compilation of Adventures" in the esteemed Tripura Rahasya.
Key Takeaways & AI Summary
This chapter explores the profound teachings of The Zenith of Non- Dual Experience. It includes 113 verses detailing core themes like "", "", "".A sacred Shakta text revealing the supreme mystery of Tripura (the Divine Mother) — a dialogue between Dattatreya and Parashurama on consciousness, creation, and liberation.