The Transcendence of the Gross, Subtle, and Causal Bodies
(Chapter 13)
Chapter 13: On the Viability of the Theory of Creation
Verse 1
चतु्दंशो>ध्यायः इत्याकण्ये मुनिवचों विचाये शुभया धिया। जगत्स्थिति स्वाप्नसमां ज्ञात्वा शोक॑ जहो द्वतम ॥ १॥
The sage's son, again at the exit from the mountain, made Mahasena unconscious with the subtle body consisting of impressions.
Verse 2
घैयेमालम्ब्य निःशोको भूयो5पच्छन्मुनेः सुतम् । मुनिपुत्र ! महावुद्धे ! त्व॑ पर/ब्वरदशनः ॥ २॥
Taking him out, he placed him into that body and revived him, fitting him well into the worn-out body.
Verse 3
ततो5्प्यविदित किश्विन्मन्ये स्यथादिति लेशतः पृच्छामि यद॒ह तनमे क्रपया वक्तुमहेसि ॥ ३ ॥
Then, Mahasena, risen, observed the external world, the land, people, trees, streams, and ponds, all new.
Verse 4
भावनाप्रभवं ह्ेतत् सब वदसि तत् कथम्। मया भूयों भाविते च न बहिः सत्रंथा भवेत् ॥ ४॥
Greatly astonished, he asked the sage's son, "Which world is this, O great one, that you have shown to me?"
Verse 5
त्वया तु भावनासिद्धया शेललोकः प्रकल्पितः । अथाउंपि देशः कालश्र युगपद् द्विविधः कथम् ॥ ५॥
"Explain this unprecedented, wonderful world," asked Mahasena. The sage's son said to him:
Verse 6
चतुर्देश अध्याय || १७॥ संकल्पसिद्धि और उसका साधन मुनिपुत्रके ये बचन सुनकर महासेनने शुद्ध बुद्धिसे विचांर किया और इस जगत्की स्थितिको स्वप्नके समान समभकर तत्काल शोक त्याग दिया ॥ १ ॥ फिर धैर्य धारण कर शोकहीन हो मुनिपुत्रसे पूछा, “परमबुद्धिमान् मुनिपुत्र ! आप परावरदर्शी हैं। [ आपको इन्द्रियातीत और इन्द्रियगोचर दोनों ही प्रकारकी वस्तुओंका ज्ञान है ]॥ २॥ तथापि मुझे अभी जो थोड़ी-सी बात अविदित-सी जान पड़ती हे उसके विषयमें कुछ प्रश्न करता हूँ, आप उसे कृपापूर्वक बताइये ॥३॥ आप बे कहते हैं कि यह सब भावनासे ही हुआ है, धो केसे ! क्योंकि *में जिसकी भावना करता हूँ बह वस्तु तो बाहर बिलकुल दिखायी नहीं देती ॥ ४ ॥ भावनाकी सिद्धि होनेके कारण आपने अवश्य पहाड़ीके भीतर स्थित लोककी कल्पना कर ली है। तथापि यह लोक और शिलालोक साथ होनेपर भी इनमें दो प्रकारके देश और काल क्यों हैं ? ॥ ५ ॥ चतुद शो उध्यायः । / १६६३ तत्राउसत्यमन्यतरत्_ कृतम॑ तन्ममेरय । इति प्ृरष्टा. मुनिसुतः प्रवक्तुम्रपचक्रमे ॥ ६ ॥
"Listen, O king, this world, which we inhabited before, has indeed undergone a transformation over a long time."
Verse 7
सह्डूत्पों भावना प्रोक्ता सिद्धाइसिद्वेति सा दविधा । सिद्धिर्विकल्पासम्भेदो(5)विकल्पस्त्वेकनिष्ठिते! ॥ ७॥
"One day in the mountain world, for us, indeed, here corresponds to twelve crores of years in time."
Verse 8
इनमें एक तो असत्य होगा ही, सो कौन-सा हैँ--यह मुझे बतलाइये |” इस प्रकार पूछे जानेपर मुनिपुत्रने कहना आरम्भ किया--॥ ६॥ “भावना संकल्पको ही कहते हैं और वह सिद्ध एवं असिद्ध दो प्रकारकी होती हे । जिस भावनामें विकल्प ( संशय ) का संश्लेष नहीं होता वह सिद्ध होती है, विकल्प न होनेका अथ हूँ किसी एकमें लग जाना ॥ ७ || इस संसारको तुम निम्चय ही ब्रह्माकी भावनासे उत्पन्न हुआ समम्दो । अत्यन्त रृढ़ताके कारण सबने इसे सत्य मान रखा है ॥ ८ ॥
"Thus, this world has passed and attained a different form. See the different customs and languages everywhere."
Verse 9
त्रह्ममावनया पद्य जात॑ जगदिद ननु । एतत् सर्चेंः सत्यरूप॑ भावित॑ सुद्ठत्वतः।. ८॥ तथा स्वसझ्नल्पभवे नास्ति कस्या5पि भावना। विकल्पसम्भेद एबोडसिद्धा तस्माद्विभावना ॥ ९॥
"In the same way, people's conditions change with time. Thus, I have seen many different world conditions."
Verse 10
भावनायाः सिद्धिरत्र बहुधा संस्थिता भवेत् । जन्मना मणिना तद्ददोषधेन च योगतः ॥ १० ॥
"See, this is my revered father with a composed mind. This is the place where you praised my father before."
Verse 11
तपसा मन्त्रसिद््या च वबरेण च भवेन्नुप)। जन्मना ब्रह्मण:ः सा वे मणिना यक्षरक्षसाम् ॥ ११॥
"See this great mountain where my world is observed. Thousands of your brother's subjects have passed away."
Verse 12
ओषधेन तु देवानां योगिनां योगतो भवेत्। तपसा तापसानां सा मान्त्रिकाणां तु मन्त्रतः ॥ १२॥
"The city named Sundara in Vanga country, which was yours before, has now become a forest filled with wild beasts."
Verse 13
"Your brother's descendant, known as Virabahu, is immediately the king of Malwa, in the city named Vishala on the banks of Kshipra."
Verse 14
"Your descendant named Susharma became a king in Dravida, in the city named Vardhana on the banks of the Tamraparni river."
Verse 15
अनिच्छया विकब्पस्थ यात्रत् सम्भेदन॑ न हि । तावत् सा भावना सिद्धा साधयेदें महाफलम् ॥ १५ ॥
"The condition of this world always changes thus, and in a short time, it became this new world."
Verse 16
सम्भेदात्त त्रिकल्पेन न सिद्धा तव भावना। भावनां साधय श्रिप्रं यदि प्रष्ड समीहसि ॥ १६ ॥
"From now, in a long time, mountains, rivers, ponds, lands will change; thus indeed is the world condition."
Verse 17
स्थिरं तावद्भवत्येब यावत् पूवं न हि स्मरेत् । एवमेव निर्विकेषष्मावना यदि सुस्थिरा ॥ १७ ॥
"Mountains go lower, lowlands become high; desert lands become wetlands, mountains become sandy."
Verse 18
श्रणु राजन ! देशकालहविध्यं वदतो मम। अव्युत्पन्नोईइसि लोकस्य व्यवहारे ह्मतस्तव ॥ १७ ॥ एतच्चित्रं भासते दे श्रृणु सम्यग् बअबीमि ते। जगड्भावस्वभावोड्यं विविधत्वेन भासनम् ॥ १८ ॥
"Hard earth, mostly rocky, becomes very soft; soft earth also becomes like stone sometimes."
Verse 19
देवताओंको; योगसे योगियोंको, त्पसे तपस्बियोंको मन्त्रसे मान्त्रिकोंको और बरसे विश्वकरमों आदिको प्राप्त हुई थी ॥ ११ ड०-१३ पू०।$ संकल्प ऐसा होना चाहिये कि में संकल्प कर रहा हूँ--इस पूरब संकल्पकी भी स्मृति न रहे | ऐसा संकल्प तबतक स्थिर रहता जबतक कि पूब्॑संकल्प न फुरे ॥ १३ उ०-१४ पू० ॥ इस प्रकार ही जब निरविकल्प भावना अच्छी तरहसे स्थिर हो जाती है और इच्छा नहोनेके कारण ही जबतक उससे विकल्पका संसग नहीं होता, तबसकभ्छह ससद्ध - भावना बड़ा भारी फल प्रदान करती रहती हू ॥ १४ उ०-१५॥ विकल्पका सम्पर्क रहनेके कारण ही तुम्हारी भावना सिद्ध नहीं हुई है। अतः यदि तुम सप्टिचरा करना चाहते हो तो तुरन्त ही अपनी , _ भावनाको सिद्ध करो ॥ १६॥ राजन् ! सुनो, अब में इस लोक और शेललोकके देश-कालोंकी द्विविधताकर रहस्य बतलाता हैं । क्योंकि तुम लोकव्यवह् रको ठीक-टीक नहीं ससभेते हो इसीसे तुम्हें यह बात विचित्र जान पड़ती है| में तुम्हें यह स्पष्ट करके समझाता हूँ, सुनो। इस तरह अनेक रूपसे भासना तो जगत््का स्वभाव ही है ॥ ६७-१८ ॥ चतुद्शोदष्यायः । १६३ एक एव हि सर्वेस्य प्रकाश्ो द्विविधः स्थित | दिवान्धानामन्धकार इतरेवां तु भासकः ॥ १९ ॥
"Barren land becomes fertile, fertile land becomes barren; gems become gravel, and gravel has the essence of gems."
Verse 20
"Saline water becomes sweet, sweet water becomes saline; sometimes there is an abundance of people, sometimes an abundance of animals."
Verse 21
जल मनुष्यपश्चादेः श्वासस्य प्रतिरोधक । मत्स्यादीनां बहिः श्रासप्रतिरोधो जले न हि ॥ २० | अग्निदहति मत्योदींस्त॑ भक्षयति तित्तिरिः । वहिनेश्यति तोयेन स जले ज्वलति कचित् ॥ २१ ॥
"Sometimes, the world is seen abundant with worms and insects. Thus, this world changes differently due to differences in time."
Verse 22
एवं सर्वे जागतास्तु भावा हेरूप्यतः स्थिताः । एवं सेन्द्रियपृत्तान्तास्त्वन्थे कैडपि निरिन्द्रियाः ॥ २२॥
"Therefore, this world was indeed such as ours before." Thus, hearing the words of the sage's son, the king...
Verse 23
स्वभावतों विरुद्धा वें शतशोध्य सहसशः । अत्रोपपचि वक्ष्यामि समाहितमना! थणु ॥ २३ ॥
Mahasena, overwhelmed with extreme sorrow, fainted. Consoled by the sage's son, the king attained wisdom.
Verse 24
Overwhelmed with extreme sorrow, he lamented like a very miserable person, for his brother, brother's sons, and his own wives.
Verse 25
. एते हि चाक्षुपा भावाखंक्षुविकृतिमात्रकाः । न चाक्षुपादंशतो5न्यद् च्श्यमस्ति क्चिद्वहिः! ! २४ ॥ प्रकाश सबके लिये एक ही होता है, किन्तु वह दो रुपमें ज्ञान पड़ता है । उल्लू आदि दिनमें अन्घे रहनेवाले जीवोंको घह अन्धकेाररूप है तथा दूसरोंकों ज्योतिस्वरूप ॥ १६ ॥ जल मनुष्य और पश्चु आदिके लिये तो समस लेनेमें बाघा डालने टला हे, किन्तु मत्स्यादिका श्वास बाहर, निकलनेपर तो घुटता हैँ पर जलमें नहीं || २० ॥ अग्नि मनुष्यादिकों तो जला देती है, पर तीतर उसे खा जाता है। तथा आग बाहर होनेपर तो ज़लसे बुक जाती हैं, किन्तु कहीं. बहूवानल कुण्डादिमें वद्द जलमें रहती भी है ।॥ २१ ॥ इस प्रकार जगसके सभी पदाय दो एपोमें स्थित हूँ। इसी प्रकार कुछ पदाथ तो ऐसे हूँ जो इन्द्रियोंसे जाने जा सकते हैं और कुछ ऐसे भी हैं जो इन्द्रियोंके विषय नहीं होते ॥ २२ ॥ इस तरह सेकड़ों-हजारों पदार्थ परस्पर. स्वभावसे बिरुद्ध दें । में इसकी उपपत्ति बतलाता हूँ, सावधान चित्तसे सुनो ॥ २३॥ ये नेत्नोंसे प्रतीत होनेवाले पदार्थ केवल नेत्रके विकार हीं हैं.। नेऋं: का दृश्य नेत्रके अंशसे भिन्न बाहर और कहीं कुछ भी चदी होता ॥।रेश्े १६४ त्रिपुरा रहस्ये ज्ञानखण्डे यथा पित्तप्रदुष्ठक्षो बहिः पीत॑ ग्रपक्यति। चर ही कस /् यथा तमिरिको 5न्यस्तु पश्यत्येक द्विधा स्थितम् ॥ २५ ॥
Remembering his sons and others separately, he lamented extremely sorrowfully. Then, as he was lamenting for his brother and others from delusion, immediately...
Verse 26
एवं विचित्रदृष्टाक्षाः पश्यन्ति विविध जगत्। ९ ग अस्ति पूचसमुद्रस्थ मध्ये करण्डकाहयः ॥ २६ ॥
The sage's son, with the intention of enlightening the king, said, "O king, you are indeed intelligent. Whom and why do you lament?"
Verse 27
ट्वीपस्तत्र जना भावान् रक्तान् पश्यन्ति वे सदा । एवं रमणकद्वीपे सदा पश्यन्ति वे जना; ॥ २७॥
"Intelligent ones indeed never do fruitless actions. Whoever does actions without considering the result is foolish."
Verse 28
व्यत्यस्तमूध्योघरतोी निखिल भावमण्डलम् । एयमन्येषु द्वीपेषू विविधा भावमण्डलम् ॥ २८ ॥
"Why do you lament the truth? Tell me, for what reason indeed is your lamentation?" Thus addressed, the extremely sorrowful king Mahasena said to him:
Verse 29
जना नेत्रस्वभावेन पद्यन्ति खलु सबंदा। तत्र तेषामन्यथा तु दृश्यते यदि कुत्रचित् ॥ २९ ॥
"Why do you not see the place of my sorrow, O great sage? Why do you ask the reason for the one whose all is destroyed?"
Verse 30
नेत्र ७ [4 छे 25 नेत्र सुसाध्यापधेन पश्यन्ति प्रावयदेव हि। अतस्तु चक्षुपा यावद् च्श्यते जगतीतले ॥ ३०॥
"Even in one person's destruction, there would be sorrow altogether for the world. Why do you ask again when total destruction is present?"
Verse 31
तावड्भवेचाक्षुपोंबशः पीतवत् पीतचद्लुपः । जिस प्रकार पित्तदोषयुक्त नेत्र बाहर पीला ही पीला देखते हैं बेसे ही तिमिर दोषवाले नेत्रोंको एक ही वस्तु दो दिखायी देती है | इसी तरह और भी तरह-तरहके दोषोंसे दूषित नेत्रोंवाले जगत्को तरहतरहका देखते हैं ॥ २५-२६ पू? ॥ लिन यूत्र समुद्रमें करण्डक नामका एक द्वीप है। वहाँ सब पदार्थोको लोग सबंदा लाल रंगका ही देखते हैं | २६ मिल कम ॥॥ | इसी तरह रमणक द्वीपमें सब लोग सब पदा्थाको उल्टे-नीचेकी ओर सिर और ऊपरकी ओर परवाले देखते हैं || २७ उ०- र८ पू० ॥ इसी प्रकार अन्य द्वीपोंमें भी तरह-तरहके लोग अपने नेत्रोंके स्त्रभावानुसार ही सबदा सब पदार्थोंको देखा करते हैं || *८ उ०-२६ पू० ॥ हाँ उन्हें यदि कोई बस्तु कहीं दूसरे पकारसे दिखायी देती हे वो वे ओपधिके द्वारा अपने नेत्रोंको ठीक करके उसे पहले ही की तरह देखने लगते हैँ ॥ २६ 3०-३० पू० ॥ अतः संसारमें नेत्रके द्वारा जो कुछ देखा जाता है वह, पीलिया रोगप्रस्त नेत्रोंसे दिखायी देनेवाले पीलेपन की तरह, उस नंत्रका हा अरा होता है ॥ ३० 3०-३१ पृ० ॥ चतुदशो5्ध्यायः | १६४ एवं प्राणादीन्द्रियाणामंशा गन्धादयोडपि हि ॥ ३१॥
Thus addressed, the sage's son also said again, as if smiling, "O king, tell me, what is this eternal family duty of yours?"
Verse 32
मानसाश्च मनोमात्रास्तथवाडखिलजागताः । क्रमोथ्प्यक्षस्वभावोत्थस्ततः- किख्िद् बहिने हि ॥ ३२॥
"If not lamenting would result in great sin, or otherwise, if the lost is obtained again by lamenting, then..."
Verse 33
शरण राजन ! बहिरिति यछोके भाति केवलम्। तदाद्य॑ सर्वजगतां जगबित्रस्थभित्तिवत् ॥ ३३॥
"O king, consider with courage, what result would come from lamenting? If lost relatives should be lamented, then listen..."
Verse 34
तस्य वाह्मस्य वक्तव्यमपादानं भ्रुवं॑ ननु। शरीर स्यादपादानं नेतरद्भवितुं. क्षमम् ॥ ३४ ॥
"Past relatives, lost, including ancestors and others, indeed should always be lamented. Why were they not lamented previously?"
Verse 35
तस्या5पि बहिराभासादपादानं कथं नु तत्। पवतादू बहिरित्युक्ते पत्तों न बहिर्भवेत् ॥ ३५॥
"Then, whose are your relatives, and where is your relationship with them? They are like worms in the excrement of your mother, father, or oneself, indeed."
Verse 36
यथा घटो भासते हि प्राहुस्तद्वच्छरीरकम् । भासकाद् बहिरित्येवं वक्तुं वाईपि न सम्भवेत् ॥ ३६ ॥
"Countless worms born from one's body and connected to it are not considered your relatives. Why and where are they not lamented?"
Verse 37
दीपसयोलोकबहिर्गतान्त॑ न हि. भासनम् । इसी तरह गन्धादि भी प्राणादिके ही अंश हैँ तथा सम्पूर्ण जगत॒के जो मानसिक भाव हैं वे सब मनोमात्र हैं। एवं देश-काल और बड़ेछोटे आदिका जो क्रम है बह भी इन्द्रियस्वभावके ही अन्तगंत हे, उससे बाहर कुछ नहीं हे || ३१ उ२-३२ ॥ राजन् ! सुनो, लोकमें जो बाहर” इस तरह भास रहा हे वही सम्पूण जगत्का मूल हे और इस जगत्-रूप चित्रकी भित्तिके समान है ॥ ३३॥ किन्तु 'डस “बाह्य'का कोई निश्चित अपादान भी तो बनाना चाहिये | [ तब यद्दी कहना होगा कि ] वह अपादान शरीर ही है, और कोई वस्तु तो हो नहीं सकती ॥ ३४ ॥ किन्तु वह शरीर भी तो बाहर ही भासता हे । ऐसी अवस्थामें चह केसे अपादान हो सकता है ? क्योंकि यदि 'पबंतसे बाहर” ऐसा कहें तो पवत तो बाहर नहीं माना जायगा | पर शरीर तो जिस प्रकार घट भासता हे उसी प्रकार भासनेवाला कहा जाता है ॥ ३५-३६ पू० ॥ ऐसा भी कह नहीं सकते कि वह भासकसे बाहर है, क्योंकि जो वस्तु दीपक या सूयके प्रकाशसे बाहर होतीं है बह तो भासित ही नहीं हो १. “अपादान' उसे कद्दते हैं जिससे वद्द बाह्य वस्तु बाहर है । १६६ त्रिपुरारहस्ये ज्लानखण्डे अतस्तु भासकस्यान्तभोस्यमस्तीति युज्यते ॥ ३७॥
"O king, consider who you are, and whom you lament as lost. Are you the body, separate from the body, or the body in conglomerate form?"
Verse 38
भासक तु न देहादिभोस्पत्वात् पर्वतादिवत्। न सर्वथा यत्त भास्यं भासक॑ तद्धि युज्यते ॥ ३८॥
"The destruction of one part of a conglomerate is called destruction. Every moment, the body undergoes part-by-part destruction."
Verse 39
भासकस्या5पि भास्यत्वे भासकस्याउनवस्थितिः । स्वस्येच भासकत्व॑ च भास्यत्वं न हि युज्यते ॥ ३९ ॥
"The decline of urine, excretion, mucus, nails, hair, etc., continually occurs. Indeed, the complete destruction of the conglomerate is not observed."
Verse 40
अतस्तु भासक शझुद्ध भासकैकस्वरूपकस । ते भारुपमेवेह . पूर्णमेकरसात्मकम् | ४० ॥ तेन व्याप्ता देशकाला भासनात्तस्य पूर्णता । अभारूपस्य चाउ्भानाद्भारूपेकर्स हि तद॥ ४१४ सकती | अतः यही कहना ठीक है कि भासित होनेवाले पदार्थ भासकके अन्तगंत ही होते हैं ॥ ३६ उ०-३७ ॥ देहादि भासक हो नहीं सकते, क्योंकि वे पबतादिके समान सासित होने वाले हैं। भासक तो वही दो सकता है जो किसी प्रकार भासित होनेवाला न हो ॥ र८॥ यदि भासक भासित होनेवाला भी हो तो भासकका निर्णय करनेमें अनचस्थो दोप उपस्थित होगा । और स्वर बद्दी अपना भासक तथा अपना ही भास्य हो नहीं सकता ॥ ३६॥ ५ अतः जो भासक है बह एकमात्र शुद्ध भाः 5रूप ही है। दह्द केवल भारूप ( प्रकाशस्वरूप )) पूण ओर एकरसात्म5 हूँ ॥ ४० ॥
"A part of your brother's body is clearly in the elements like earth, etc. Ultimately, the body-space is only indestructible."
Verse 41
जो अप्रकाशरूप होगा उसका तो भान ही नहीं हो दाकता | इसलिये बह एकरस प्रकाशस्वरूप ही हैं ॥ ४१॥
"You are not the body, but the possessor of the body. Just as you say 'my body,' similarly, how can you be the body?"
Verse 42
भीतर ओर बाहर जो कुछ भी है वह सब उस प्रकाशस्वरूपके पेटमें ही स्थित है। इसलिये जेसे पबत अपने शिखरका अपादान नहीं हो सकता, उसी प्रकार वह उसका अपादान नहीं हो सकता | ( तात्पय यह कि जिस प्रकार शिखरको पत्रतसे एथक् या पवतसे भाहर नहीं कह सकते उसीम्रकार प्रपन्चको प्रकाशस्वरूप चेतनसे प्रथक् या बाहर नहीं कह सकते ] ॥ ४२॥
"If you are separate from the body, what connection do you have with other bodies? Just as there is no relationship with the garments of brothers."
Verse 43
एवंविधं हि. भारूप॑ ग्रस्तसवेप्रपश्चकम । भाति स्व्॒तन्त्रतः स्वस्मिन् स्वत्रापपि च सबेदा ॥ ४३ ॥
"How can you lament the destroyed bodies due to non-difference? My body, my senses, my life, my mind, thus you are."
Verse 44
एतत् परा चितिः प्रोक्ता त्रिपुरा परमेश्वरी। ब्रह्मेत्याहुवेंदविदों विष्णु वेष्णवसत्तमाः ॥ ४४ ॥
"O king, tell me your true essence," he said to Mahasena. Addressed thus, Mahasena deeply reflected for a moment.
Verse 45
सा शंवोत्तम ख्र शिव ४ प्राहुः शक्ति शक्तिपरायणाः । एतद्रपारते किखिंद् यदि ब्रुयुस्तदल्पकम् ॥ ४५ ॥
Unable to answer the sage's question, very distressed, Mahasena said, "O lord, I do not know who I am completely."
Verse 46
ग्याप्त & ८ (७ /< ८65 तया उठ तु चच्छकत्या दपणग्रातात्रम्बवत् । तस्य भास्यक्ृत भासकत्वं च न स्वतः स्थितम् ॥ ४६ ॥
"Naturally, I lament without knowing the reason. I have surrendered to you, O lord, distressed. Tell me what this is."
Verse 47
एवा हि प्रथमा सृश्रिविद्या तम उच्यते। हेतकों, जिसका कोई निमित्त या उपादान कारण नहीं है और जो परस्पर अत्यन्त विलक्षण है, भासित कर रही है ॥| ५२ उ०-४३ ॥ जिस प्रकार [ प्रतिबिम्बके कारण ] अनेकरूप प्रतीत होनेवाले दपणमें अपने सामान्यरूपस अबाधित एकत्ध स्पष्ट भासता है, उसी प्रकार [ जाम्रदादि अवस्थाओंके कारण ] यह विचित्र जगत् अनेकरूपस भासित होनेपर भी, इसमें किसी प्रकार भी बाधित न होनेबाला एक तत्त्व सिद्ध है ही, क्योंकि इसकी विभिन्न अबस्थाओंका' एक ही के द्वारा स्मरण होता है ॥ ५४-५४ ॥ राजन् ! तुम अपनेमें ही अपने मनोराज्यके समयको स्थितिका विचार करो । वह अनेक प्रकारके रूपोंबाली होनेपर भी बास्तवमें चतन्यमात्र ही तो होती है || ४६ ॥। बड़ चिति, संष्टि हो अथवा प्रलकः निर्विकल्पा ही रहती हैं, जैसे प्रतिबिम्ब हो अथवा न हो दपण शुद्ध ही रहता हैं ॥ ४७ ॥
"All lament for any dead relative. They do not know their self and certainly do not lament for others."
Verse 48
तथा चिति जगद्धाति यत्तन्नेबातिरिच्यते। दपेणात्मनि सम्पूर्ण निबिडे चेकरूपिणि ॥ ४८ ॥
"O lord, tell this clearly to your disciple," Mahasena asked. Then the sage's son spoke to Mahasena.
Verse 49
यथा हि भिन्न नगरं सर्वथा नोपपचते। तथा पूर्ण उस्तु नित्रिडे चेकरूपे चिदात्मनि ॥ ४९॥
"O king, listen. Deluded by Mahadevi's illusion, people always lament uselessly without knowing their self."
Verse 50
"Until the true essence of the self is known, people certainly lament. Knowing it, they do not lament anywhere again."
Verse 51
भरे कक जगत् सवोत्मना नंत्र ह्यपपत्ति समश्नुते। आकाशस्त्ववकाशात्मा शून्यरूपत्वहेतुतः || ५० ॥ ७ ब् कप इत जगत् ग्रसहते सतत्रेव हि सवेदा। सती चितिरशून्यात्मरूपिण्येक्सा कथम् ॥ ५१ ॥
"Just as oneself deluded by sleep laments without knowing itself, a man deluded by a magician's spell laments by illusion."
Verse 52
द्वितीयलेशं प्रसहेदादशोत्मवदज्ससा । तस्मादादशबत् संवित् स्वातन्त्यभरवैमवात् ॥ ५२ ॥
"Just as one laments by the fear of a snake created by illusion, thus, deluded by illusion, one laments without knowing oneself."
Verse 53
भासयेदद्वितीये स्त्रे रूपे सबब चराचरम् । कल मा दर्षणमें दीखनेबाले नगर आदि जैसे दपेणसे अभिन्न होते हैं वेसे ही सम्पूर्ण भास्यवर्ग अपने भासकसे अभिन्न है | द्पणका नगर जसे द््षणसे भिन्न नहीं होता बैसे दी जिस जगत्को चिति प्रकाशित करती है. वह चितिसे भिन्न नहीं हे | ४७-४८ पू० ॥ जिस प्रकार एकरूप घनीभूत एवं सम्पूर्ण ( अवकाशहीन ) दर्पणसे भिन्न उसमें प्रतिबिम्बित नगरकी सत्ता किसी प्रकार सम्भव नहीं हे, उसी प्रकार एकरूप, घनीभूत एवं परिपूर्ण चिदात्मामें जगत्की प्रथक् सत्ता किसी प्रकार नहीं हो सकती ॥| ४८ उ०-४५० पू० ॥ « आकाश तो अवकाशरूप और शून्यात्मक है, अतः उसमें तो सबंदा सवंत्र ही द्वेटरूप जगत् समा सकता है ॥ ५० उ०-५१ पू० ॥ किन्तु सत्स्वरूपा चिति, जो अशुन्यात्मा एकरूपिणी और एकरसा है, स्वभावसे ही दर्पणके समान किस प्रकार लेशमात्र द्वतको भी सहन कर सकती है १॥ ४१ ड०-५२ पू० ॥ अतः बह चित् शक्ति अपने स्वातन्त्यरूप सामथ्यके प्रभावसे दपणके समान अपने ही अद्वितीय स्वरूपमें इस सम्पूणे चराचर चंतुदं शोउष्यायः । १६६ निर्मित्तोपादानहीन॑. द्वितीयमतिचित्रितम् ॥ ५३ ॥
"Just as one awakened from a dream or knowing a magician's spell does not lament anywhere and laughs at others in grief."
Verse 54
यथा5्नेकरूपविधे भासमानेडपि. दर्षणे । एकत्व॑ भासते स्पष्ट मविशेषाददूषितम ॥ ५४ ॥
"Thus, knowers of the self, freed from illusion, do not lament anywhere and laugh at those like you deluded by illusion."
Verse 55
तथा विचित्र जगति भासमानेडप्यनेकधा । अनुसन्धानसंसि द्धमेक दोषविवज्जितम् ॥ ५५ ॥
"Knowing the true essence of the self, crossing the difficult illusion, destroy grief arising from delusion through true reflection, O mighty-armed one."
Verse 56
राजन् स्वात्मनि सम्पश्य मनोराज्यद्शास्थितिम् । अनेक चित्रयवपुर पि चतन्यमात्रकम् ॥ ५६ ॥
Thus addressed, Mahasena again said to the sage, "O lord, the example you stated is indeed difficult."
Verse 57
सृष्टों वा प्रठये वा5पि निर्विकल्पव सा चितिः प्रतिश्रिम्बस्य भावे वाड्प्यभावे वेत्र दर्षणः ॥ ५७॥
"The dream or illusory world appears to have a void nature, but this waking world is real and fulfills all purposes."
Verse 58
एवंविधेकरूपाईपि चितिः स्वातन्त्यहेतुतः स्वान्तर्विभासयेद्वाह्ममादर्श गगन यथा ॥ ५८॥
"How can the uncontradicted and stable waking world be like a dream?" Thus addressed, the very wise sage's son again explained.
Verse 59
इस प्रकार एकरूपा होकर भी यह चिति अपने स्वातन्तश्यके कारण दर्पणमें -आकाशके समान अपने आन्तरिक स्वरूपको द्वी बाह्यरूपसे भासित करती है ॥ ४८ ॥ यही पहली सष्टि हैँ; यद अविद्या या तम कही जाती हैं | २०८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे पूणस्यांशेनेव भान॑ बाह्याभासनमुच्यते ॥ ५९ ॥
"Listen, O king, to what you stated, that the example is difficult. This is your second delusion, like a dream within a dream."
Verse 60
पूणोहम्भावविच्छेदादनहम्भावरूपता । एपवा5व्यक्तमित्युक्ता जडश्नक्तिथ कथ्यते ॥ ६०॥
"Does not even a dream tree at that time provide benefit to travelers and remove their heat by providing shade?"
Verse 61
या चितिथाउत्र विच्छिन्नाभासिनी बहिरात्मनः। शिवतत्तमिति प्रोक्ता शक्तिस्तद्वासनं भवेत् ॥ ६१ ॥
"Does the dream satisfy the dream and mortal beings by fruits and others? Where is the obstruction in the dream, and how is it observed as stable?"
Verse 62
बहीरूप महाशृन्यं॑ कल्पितं यत्तदेव तु। अहम्मावा55च्छादनेन सदाशिवमयं स्पृतम ॥ ६२ ॥
"If you say the entire dream is obstructed in the waking state, listen: is not the entire waking world obstructed in deep sleep?"
Verse 63
तदेव जाव्यमुख्यत्वे देधराख्यं प्रचछ्षते । पूर्ण तत्त्का अंशके समान भान होना ही बाह्याभास कहा जाता ह॥५४॥ परिपूर्ण आत्मतत्त्वमें अहंभाव न रहनेपर जो अनहंभावरूपता आती है वही अव्यक्त कट्टी जाती है और उसीको जडशक्ति कहते हैं. ॥ ६० ॥ जो थबिति इस लोकमें परिच्छिन्न रूपसे अपनेको बाह्यमभावसे प्रकट करती है पही 'शिवतत्त्वः कही जाती हैँ । उसका जो वाह्मरूपसे भसना है वही शक्ति! है ॥ ६१ ॥ जो महाशून्य बाह्यरूपसे कल्पित हुआ है वही जब “यह मे हूँ! इस प्रकार अहंभावसे आच्छादित होता हे तो उसे 'सदाशिव! कट्दा जाता है ॥ ६२ ॥ बही जडताकी मुंखूुयता होमेपर ईश्वर नामका चौथा तत्त्व कहलाता ३. आरमतरव प्रत्यक्वेतन्य होनेके कारण अद्दमर्थ ही है। प्रलयादि निविकदप अवस्थार्मे वह शुद्ध चित्र प हो रहता है। अपनी स्वातन्ध्य शक्तिके द्वारा जब उसको विकव्पाभिमुख बसा होती है नब उसमें अहंभावका अभाव हो जाता है। यद समष्टि अएंकी जवस्थः है। इसीफो वेदान्त प्रन्थो्मे मायाशक्ति कद्ठा है। फिर अजब विकश्प दक्मा प्राप्त होती है तो परिस्छिन्न या ब्यष्टि अहंकी स्कूत्ति द्ोती है। इसे अविधा या जडसक्ति कहते हें। हस प्रकार भगवानकी चिस्छुक्ति या डनके स्वरूपरूुन स्वातन्ध्यञा ये तीन अवस्थाएँ होती हैं। इन तीन श्छोकर्मे क्रमज्: इन्हीं तो वो अवस्थाओं का वर्णन है । २. पूर्ण चतन्य में कोई बाह्याभास नहीं होता । उस अवस्थामें उसे 'परमशिय' कहने हैं । फिर श्रष्टि रचना द्वोनेपर विभिन्न परिस्थिन्न विशेषोर्मे जो ए% सामान्य निधिकतप चेतन अनुरास रहता है उसका नाम 'शिवतरव' है ओर उस निविकरप चेतनक्ा परिच्छिन्न अह्ंरूपसे भासना 'दाक्ति' हे। इस प्रकार जो सश्टिसे पर्व परमदिष कहट्दा जाता है वही सृष्टिकालमें सामान्य चिति रूपसे 'शिवतस्व! और णहंभासरूपसे 'दाक्तितरव' या जीव है । चतुदं शो 5ध्याय: । सं अनयोः संबेदनं॑ तु॒भेदाउ्मेदविमशनम ॥ ६३ ॥
"If you say it is not obstructed the next day due to continuation, then where is the continuation of the dream the next day?"
Verse 64
गुद्भधविद्येति सम्प्रोक्तमेतावच्छुद्धम॒ुच्यते । भेदशक्तेरप्ररुृत्या. चा5मभेदात्माध्वभासनात् ॥ ६४ ॥
"If you say there is no continuation in the dream, O king, listen: where is the appearance of continuation in the new experience in waking?"
Verse 65
अथ चित्स्वातन्त्यभरात् प्ररूढे भेदभावने । जडशक्तिधमिंभाव॑ चितिधमौत्मतां ययौ ॥ ६५॥
"If you say the continuation appears elsewhere in the new experience, listen: thus, in the dream, too, the continuation appears indeed in the stable appearance."
Verse 66
तदा सा जडशक्तिस्तु मायातत्त॑ प्रचक्षते । माया विभेदवुद्धिस्तु भेदप्रचुरभावनात् ॥ ६६ ॥
"If you say there is false continuation in the dream, thus, in waking, too, it is so. Consider with a subtle intellect that thing established in waking."
Verse 67
भेदप्रचुसंवीता चितिः सह्डचितात्मिका । पश्चकज्चुकसम्व्याप्ता पुरुषत्व॑ पग्रपद्यते ॥ ६७ ॥
"The body, tree, river, lamp, and so on are momentarily different. How can that continuation indeed be of true essence?"
Verse 68
कलाविद्यारागकालनिय तिः पश्चकञ्चुकम् । कला किश्वित्कत्तता स्यादिया किश्िज्जता भवेत् ॥ ६८ ॥
"Even immovable things are not connected to the next moment; their form is always fragmented by streams."
Verse 69
है। इन सदाशिव और ईश्वरतत्त्का यह में हैं? और 'में यह हूँ? इस प्रकार भेदाभेद भेदरूपसे भासना ही 'शुद्धविद्या' नामका पाँचवाँ तत्त्व कहा जाता है। शिवतत्त्वसे लेकर यहाँतक ये पॉँचो तत्त्व भेदशक्ति ( जडता ) का बिकास न होनेसे तथा अभेदस्वरूप आत्मतत्त्व के ही अवभास होनेके कारण 'शुद्ध कहे जाते हैं ॥| ६३-६४ ॥ फिर जब चित्स्वातन्द्रयके माहात्म्यसे भेदभाव बढ़ने लगता हे तो जडशक्ति धर्मी भावको भ्राप्त हो जाती है और चिति उसका धर्म हो जाती है ॥ ६५॥ तब वह जडशक्ति ही मायातत्त्व कही जाती है। माया भेदबुद्धिका नाम हे, क्योंकि उसमें भेद्प्रधान भावना रहती है ॥ ६६॥ भेदभावकी प्रचुरतास व्याप्त चिति संकृचित हो जाती है तथा ऐसे पाँच कज्चुक ( आवरणों ) से व्याप्त होकर वह पुरुषभावको भ्राप्त हो जाती हे ॥ ६७ ॥ वे पाँच कञ्चुक हें--कला, विद्या, राग, काल और नियति | कुछ 'मैं यह हूँ' इसमें 'में' चिद्रप है और 'यद' महाशून्य जडतत्त्व है । जब 'में” की प्रधानता होती है तब 'सदाशिव” और जब 'यह' की प्रधानता होती है तब ईश्वरतरव द्दोता है। "में! भौर 'यह! में तरवदृष्टिसे अमेद है और उदलेख की दृष्टिसे भेद है। इस प्रकार हनका भान भेदासेदरूपसे होता है । २०२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे रागस्तृष्णा परिच्छित्तिरायुषा काल उच्यते | नियतिः परतन्त्रत्वमेतेयुक्तस्तु. पूरुषः ॥ ६९॥
"Mountains are always fragmented by mice, insects, boars, streams, and others from all sides."
Verse 70
चितिशक्तिमधिष्टाय. विचित्राइनादिकमंणाम् । जनानां वासनापिण्डः स्थितः प्रक्ृतिरुच्यते ॥ ७० ॥
"Mountains, oceans, and the earth even are momentarily changing. Now I will explain to you; observe with a subtle intellect, O king."
Verse 71
फल तु त्रिविध्॑ यस्मात् कमेणां सा त्रिरूपिणी । अस्या अवस्थाभेदोी हि चित्तमित्यभिधीयते ॥ ७१ ॥
"The limited continuation in dreams and waking is indeed the same, while the unlimited continuation in actions is extremely rare."
Verse 72
मुषुप्ती प्रकृतिज्षेया तदन्ते . चित्तमनच्यते । वासनापिण्डसहिता. चितिश्रित्तम्दीरितम् ॥ ७२ ॥
"Continuation always exists by cause and form. If so, the cause is certainly consisting of earth and others."
Verse 73
अव्यक्तमे तदेवोक्त॑ वासनापिण्डभावतः । पुरुपाणां विभेदेन चित्त बहुविध॑भवेत् ॥ ७३ ॥
"That continuation is also observed in the dream due to the appearance of earth and others. Now, the obstruction of the dream is experienced in waking."
Verse 74
जीवानामविभेदेन सुषप्ताेवेकेधा हि. ततू। प्रकृतित्व॒ समायाति तदन्ते चित्ततामियात् ॥ ७४ ॥
"The obstruction of waking does not appear to anyone anywhere. If so, listen, I will explain: obstruction is indeed non-appearance."
Verse 75
कर सकना कला है, कुछ जान सकना विद्या है,राग तृष्णाको कहते हैं, आयुकी सीमा काल है और परतन्त्रता नियति है। इन पाँच कब्म्चुकोंसे जो युक्त हे उसे पुरुष” कहते हैं | ६८-६६ ॥॥ जीवोंके शुक्ल-कऋष्णादि अनेक प्रकारकं अनादिकालीन कर्मोकीं बासनाओंका जो समूह चितिशक्तिको आश्रय करके स्थित है वह “प्रकृति! कहलाता है ॥| ७० ॥। क्योंकि कर्मोका फल सुख, दुःख एवं मोह रूप तीन प्रकारका होता हे इसलिये बह प्रकृति भी सक्त्य, रज एवं तम तीन रूपोंबाली है | उसीका एक अवस्थाभेद चित्त! कहा जाता है ॥ ७१ | सुपुत्तिमं उसे “प्रकृति! क ओर सुषुप्तिका अन्त होनेपर वहीं गंचत्त! कहा जाता है | वासनाप्तमृहके सहित जो चिति है बही “चित्तः कहलाता है || ७२ ॥ बासनासमूदसे युक्त होनेके कारण यह चित्त ही अव्यक्त'ः भी कहा जाता है। एमुपोंके भेदके अनुसार चित्त भी अनेक प्रकारका होता है || 3३ | किन्तु सुपृ्तिमं पुरुषोंका भेद नहीं रहता, इसलिये उस समय वह एक ही प्रकारका होता हैे। उस अबवस्थामें वह प्रकतिभावको प्राप्त हो जाता है और उसका अन्त होनेपर चित्तरूपताको ॥ ७४ ॥ चतुदंशो5ंध्यायः । २०३ एतदेव. अमान प्रोक्तश्रितिग्राथान्यहेतुना । अव्यक्तप्राधान्यतस्तु॒ चित्तप्रकृतितामियात् ॥ ७५ ॥
"In deep sleep, the non-appearance of the entire world is experienced. Now, if obstruction is indeed the absence of perception, then listen."
Verse 76
क्रियाभेदात्तत्रिविधमन्तःकरणमसुच्यते | अहड्जारचुद्धिमनोरूपेण नृपसत्तम ! ॥ ७६ ॥
"The absence of perception does not exist for the deluded like you, indeed. For those who know the truth, the absence of perception is clear."
Verse 77
इस प्रकारके इस प्रकाशस्वरूपने सम्पुण प्रपञश्चको अपनेमें ग्रस्त किया हुआ हूँ। वह सवंदा सबत्र स्व॒तन्त्रतासे अपनेमें' आप ही प्रकाशमान है | ४३॥ यह पराचिति ही भगवती त्रिपुरा कही गयो है। वेदिक विद्वान इसीको त्रह्म कहते हैं ओर बेष्णव विष्णु ॥ ४४ || श्रेष्त शेब इसे शिव बताते दें और शाक्त लोग शक्ति | इस चिद्र पसे भिन्न जो कुछ कहा जायगा वह अपूर्ण ही होगा ॥ ४२ ॥ प्रतिविम्ब्र जिस अ्रकार दपणसे व्याप्त रहता हूं उसी प्रकार यह सत्र उस चेतन शक्तिते व्याप्त है | इसका जो भासकत्व हे वह भास्यके कारण है, स्वत: नहीं ॥ ४६॥। श्ध्द त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे * पी ग्ड् < भास्य॑ तु भाननिमस्नमादर्श नगरादिवत्। मि € दपणे। नगरं यद्ददरपणान्नातिरिच्यते ॥ ७७॥
"Therefore , this network of perceptions is in the same state as dream perception. A long duration appears in the dream without distinction."
Verse 78
ज्ञानकर्मेन्द्रियाणां तु पश्चक स्यात्ततः 'एथक | शब्दादिगगनादीनि भूतानि स्पूलखइमतः ॥ ७9 ॥ एवं सा परमा संत्रिद् बाह्याभासप्रपूवंकम् । क्रीडां करोति सृष्य्यादिक्रमेण स्वेसाक्षिणी ॥ ७८ ॥
"Therefore, the unobstructed, functioning, and stable dream state is similar to the waking state in every way."
Verse 79
तत्राउच्चया श्रीत्रिपुराशक्तया सृश्ो ग्रभावतः । हिरण्यगर्भा यो ब्रह्मा तस्येतद्धावनोत्थितम् ॥ ७९ ॥
"As the waking state is clearly grasped in waking, the waking state is also grasped in the dream like that."
Verse 80
जगत्तत्र तु या संविचमहंरूपभासिनी । सा परेंव हि चिच्छक्तिस्तद्धेदो न तु विद्यते ॥ ८० ॥
"Thus established, where is the distinction, O king, between dream and waking? Then, why do you not grieve for your own relatives in the dream?"
Verse 81
चितिकी प्रधानताके कारण यह चित्त ही 'पुरुष” कहा जाता है तथा अव्यक्त की प्रधानतासे यही चित्त ओर प्रकृति रूपताको प्राप्त हो जाता है । ७५ | नपश्ने्ठ ! क्रियाभेदसे बह चित्त ही अहंकार, बुद्धि एवं मन तीन प्रकारका अन्त:ः:करण कहलाता है ॥ ७६॥ उस त्रिगुणात्मक अहंकारसे पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ , पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा शब्दादि सूच्रम एवं आकाशादि स्थूज़ भूत उत्पन्न होते हैँ ॥| ७७॥ इस प्रकार वह सर्वेसाक्षिणी परमा चिति बाह्माभासपृथेक सृष्टि आदि क्रमसे क्रोडा कर रही है || 5८ ॥ इस सरष्टिक्रममें सबकी मूलकारण त्रिपुराशक्ति हे। उसकी भावना से जो हिरण्यगर्भ ब्रह्मा हुआ हे उसीके संकल्पसे यह संसार उत्पन्न हुआ है । इसमें जो तू? "में! रूपसे भासनेवाली संवित् है वह परा चत् शक्ति ही हे | उसमें कोई भेद नहीं है ॥ ७६-८० ॥। 4. श्रोच्न, स्वक् , चछु, जिद्दा और प्राण । २. वाक् , पाणि, पाद, पायु और उपस्थ | ३. शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्ध-ये पाँच तम्मात्राएं सूच्म भून हैं । ४. आकाद्ा, जायु, अग्नि, जल और पृथ्वी-ये पाँच स्थूल भूत हैं । २०४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे भेदस्त्वॉपाधिकों भाति टद्यपाधिन्रह्ममावितः । तद्भावनोपसंहारे नास्ति भेदस्य भासनम् ॥ ८१ ॥
"In this world, reality is established by mere thought. By thinking of emptiness, it also becomes emptiness without resistance."
Verse 82
चितो या भावना शक्तिमायया ते समाबृता। तदावरणहाने तु तब सा सिद्धिमेष्यति ॥ ८२ ॥
"Indeed, thought stabilized by the absence of validation becomes the truth by its own nature, O king."
Verse 83
देशः कालोड्यवा किश्विद् यथा येन विभावितम्। तथा तत्तत्र भासेत दीघपसक्ष्मत्वभेदतः ॥ ८३ ॥
"Indeed, if you have seen my world as an example here, after circumambulating this mountain, come, and we shall see it now."
Verse 84
मयकदिनरूपेण. भातरित॑ तदिनेककम ।ै। ब्रह्मणा तावदेब्राउत्र. द्वादशा5्वुदरूपतः ॥ ८४ ॥
Thus having said, he took the king by hand and circumambulated the mountain, arriving there together with the king.
Verse 85
Again, the wise son of the sage spoke to Mahasena: "O king, see this mountain extending a couple of miles."
Verse 86
"Indeed, seen in its womb, your world is widely and clearly displayed. Is this waking or a dream, true or false?"
Verse 87
भात्रितं तेनेबमेतचिरशीघ्रत्तममासनम् । ब्रह्मणा निर्मिते शेले पादगव्यूतिसम्मिते ॥ <८५॥ मयाउनन्तग्रदेश्य भावितल्वादनन्तता । एवं च द्यमप्यनत्न सत्यं चाउसत्यमेव च॥ <६ ॥ भेद उपाधिके कारण भासता हे और उपाधि त्रद्माकी भावनासे हुई हें। अतः उसकी भावनाका अन्त होनेपर भेदका भास भी नहीं होता ॥ ८१ ॥। तुममें जो चितिकी भावनाशक्ति है बह मायासे ढकी हुई है। उस आवरणकी निवृत्ति हो जाने पर वह तुम्हारे लिये सिद्ध (प्रकट ) हो जायगी ॥ ८२ ॥ देश, काल अथबा कोई भी बस्तु हो उसके विषयमें जिसकी जेसी भावना है उसीके अनुसार वह उसे अल्प या दृहत रूपस भाषता हू ॥ ८३ ॥ मेंने [ अपने संसारमें ] एक दिनकी भावनाकी थी। इसकिये एक दिन हुआ। किन्तु उठने ही काज़की ब्रह्मान बारह अरब वपरूपसे भावना की। इसीसे यह एक ही कालन दाघता आर रात्रताका भास हुआ || ८४-८४ पू० ॥ त्रह्मके बनाये चौथाई गव्यूतिमात्र पर्वतम मेने अनन्त देशकी सावना का, इसालय उसमे अनन्तता भासी | इस प्रकार ये अनुभूतिया दोनों प्रकार की हँ--[ व्यावहारिक इृष्टिस ] सत्य भी हैँ ओर [ पारमाथिक दष्टिस ] असत्य भी ॥ ८५ उ०-८६ ॥ चतुदेशो5्ध्यायः । २०४ त्वमप्यन्तःक्रोशमितं देश काले कलात्मकम् । विभाव्य भूयस्तत्रेव॒ भावया5नन्तयोजनम ॥ ८७ ॥
"In the mountain world, one day is here experienced as twelve million years. Discern whether this is true or false."
Verse 88
"There is no distinction between this and different dreams. From this, know that the essence of the world is thought alone."
Verse 89
असह्ृथकालमपि च भासेद्यावंद्धि भावनम | तस्माद्भावनमात्रात्मरूपमे तज्जगद्बहिः ॥ ८८ ! चिदात्मरूपे व्यक्ते वे भासते मनुजा5ंघिप। तस्माद्वाह्यात्मका5्व्यक्तमित्तो चित्रमयं जगव् ॥ ८९॥
"This unreal world dissolves in a moment. Therefore, abandon grief, O king, understanding that the world is like a dream."
Verse 90
अव्यक्तभित्तिमात्र स्यात् सा स्त्रभित्तिचिदात्मिका । अब एवं चिराह्मस्यो द्रदेशोडपि योगिनः ॥ ९० ॥
"Considering yourself as a dream-picture on the wall, consciousness in essence, a reflection like in a mirror, so you are situated."
Verse 91
क्षणेन गत्वा पद्यन्ति करामलकवद् भ्रुवम्। तस्माद् दूर समीप वा चिरं श्रीप्रभाष्पि वा ॥ ९१॥
"Know the waking state as a picture in a mirror, and yourself as consciousness in essence. Become supremely blissful in heart quickly, O king."
Verse 92
भावनामात्रसंसिद्ं विदपेणसमाश्रितम्॒ ै। निश्चित्येव॑ त्यज अ्रास्ति शुद्धचिद्भावनक्रमात् ॥ ९२ ॥
Thus ends the thirteenth chapter named "Observing the World of Shailaloka" in the revered Knowledge Section of Tripura Rahasya.
Key Takeaways & AI Summary
This chapter explores the profound teachings of The Transcendence of the Gross, Subtle, and Causal Bodies. It includes 92 verses detailing core themes like "", "", "".A sacred Shakta text revealing the supreme mystery of Tripura (the Divine Mother) — a dialogue between Dattatreya and Parashurama on consciousness, creation, and liberation.